नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने आक्रामक वैश्विक रुख के कारण सुर्खियों में हैं. इस बार मामला ग्रीनलैंड का है, जहां नियंत्रण को लेकर ट्रंप ने सैन्य विकल्पों पर विचार करने का आदेश दिया है. इस कदम ने न सिर्फ यूरोप को चौंका दिया है, बल्कि अमेरिकी सेना, नाटो सहयोगियों और अंतरराष्ट्रीय कानून को लेकर भी गहरी चिंता पैदा कर दी है.
डोनाल्ड ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से अहम बताते रहे हैं, लेकिन अब मामला बयानबाजी से आगे बढ़ता दिख रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने स्पेशल फोर्स कमांडरों से संभावित सैन्य कार्रवाई की योजना तैयार करने को कहा है. उनका तर्क है कि अगर अमेरिका ने समय रहते कदम नहीं उठाया, तो रूस या चीन इस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है.
सूत्रों के अनुसार ट्रंप के कुछ करीबी सलाहकार इस योजना को आगे बढ़ा रहे हैं. इनमें राजनीतिक सलाहकार स्टीफन मिलर का नाम प्रमुख बताया जा रहा है. इनका मानना है कि वेनेजुएला में निकोलस मादुरो को हटाने के ऑपरेशन की सफलता के बाद अब ग्रीनलैंड पर भी निर्णायक कदम उठाया जाना चाहिए. यह सोच व्हाइट हाउस के भीतर ही मतभेद पैदा कर रही है.
अमेरिकी सेना के शीर्ष अधिकारी ट्रंप की इस योजना से सहमत नहीं हैं. जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ का साफ कहना है कि ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगी और अमेरिकी कांग्रेस भी इसका समर्थन नहीं करेगी. सैन्य नेतृत्व इसे अवैध, खतरनाक और अमेरिका की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने वाला कदम मान रहा है.
अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाता है, तो इसका असर नाटो पर पड़ना तय है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और डेनमार्क से टकराव की स्थिति बन सकती है. राजनयिक दस्तावेजों में चेतावनी दी गई है कि यह कदम नाटो को भीतर से कमजोर कर सकता है, जिससे गठबंधन के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा.
ट्रंप की धमकियों के बीच ग्रीनलैंड के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने संयुक्त बयान जारी किया है. उन्होंने साफ कहा है कि ग्रीनलैंड न अमेरिका का हिस्सा बनना चाहता है और न ही डेनमार्क के अधीन रहना चाहता है. नेताओं का कहना है कि ग्रीनलैंड का भविष्य वहां के लोग खुद तय करेंगे, किसी बाहरी दबाव के तहत नहीं.