US Israel Iran War

ट्रंप का चीन पर साइलेंट वार, ईरान पर हमले के जरिए फ्यूल सोर्स खत्म करने का बनाया मास्टरप्लान

प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने एक तीर दो निशाने लगाए है. उन्होंने ईरान पर हमले के जरिए चीन पर साइलेंट वॉर का आगाज कर दिया है...

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Ashutosh Rai

प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को टारगेट करते हुए इजराइल के साथ जो US जॉइंट मिलिट्री ऑपरेशन किया है, वह सिर्फ मिडिल ईस्ट के संघर्ष तक सीमित नहीं है. एक एनालिसिस के अनुसार, यह ट्रंप की एक बड़ी जियोपॉलिटिकल स्ट्रैटेजी है. इसके जरिए अमेरिका के ग्लोबल दुश्मन चीन पर इनडायरेक्टली बड़ा हमला किया गया है. इस कदम का मुख्य मकसद एशियाई महाशक्ति चीन के सस्ते तेल के सोर्स को पूरी तरह से बंद करके उस पर दबाव डालना है.

वेनेजुएला पर हमला

चीन के लिए यह एनर्जी सिक्योरिटी के मोर्चे पर लगातार दूसरा सबसे बड़ा झटका है. इससे पहले जनवरी में यूएस ने चीन के एक और बड़े फ्यूल सोर्स, वेनेजुएला के लीडर निकोलस मादुरो को सत्ता से हटा दिया था. मादुरो के हटने तक वेनेजुएला चीन की तेल जरूरतों का लगभग 4 परसेंट सप्लाई करता था. चीन को उम्मीद थी कि वह वेनेज़ुएला के नुकसान की भरपाई ईरानी तेल इंपोर्ट से कर लेगा, लेकिन ट्रंप के इस मिलिट्री कदम ने उसकी यह उम्मीद भी लगभग खत्म कर दी है. ईरान और वेनेज़ुएला दोनों ही चीन के करीबी स्ट्रेटेजिक सहयोगी थे जो उसे बहुत अच्छी शर्तों पर तेल देते थे.

चीन के सस्ते तेल का मुख्य सोर्स बंद

लंदन-बेस्ड सेंटर फॉर इन्फॉर्मेशन डिफेंस एंड स्ट्रैटेजीज के रिसर्च हेड मैडी कप्पारोव के मुताबिक, अमेरिका का सीधा लक्ष्य चीन के सस्ते तेल का मुख्य सोर्स बंद करना था. एनालिटिक्स फर्म केप्लर के अनुसार, साल 2025 में चीन ने ईरान के शिप किए गए तेल का 80 परसेंट से ज्यादा हिस्सा खरीदा था. न्यूज एजेंसी का अनुमान है कि चीन का लगभग 13 परसेंट समुद्री क्रूड ईरान से ही आता है, जिसे अक्सर मलेशिया सहित अन्य जगहों से गुप्त शिप-टू-शिप ट्रांसफर के ज़रिए पहुंचाया जाता है. 

ईरान की सप्लाई में रुकावट

कप्पारोव ने यह भी साफ किया कि चीन ने भले ही कोयले और रिन्यूएबल एनर्जी में भारी इन्वेस्ट किया हो, लेकिन दुनिया की कोई भी मिलिट्री कोयले या रिन्यूएबल एनर्जी पर नहीं चल सकती. ऐसे में ईरान की सप्लाई में रुकावट आने से चीन की डिफेंस तैयारियों और मिलिट्री ताकत पर सीधा असर पड़ना तय है. बड़ी-बड़ी बातें करने वाला चीन मुश्किल वक्त में अपने सहयोगियों को बचाने के लिए कुछ नहीं कर सका, जिससे एक ग्लोबल पार्टनर के तौर पर चीन के भरोसे पर बड़ा शक पैदा हो गया है.