बेकार समझी जाने वाली ऊन पिघलते ग्लेशियरों को बचाने में आएगी काम! स्विट्जरलैंड में शुरुआती नतीजों ने वैज्ञानिकों को भी चौंकाया
स्विट्जरलैंड में वैज्ञानिक ग्लेशियर की बर्फ को पिघलने से बचाने के लिए भेड़ की ऊन से बनी चादरों का परीक्षण कर रहे हैं. त्सानफ्लूरॉन ग्लेशियर पर करीब 200 वर्ग मीटर क्षेत्र में ये चादरें बिछाई गई हैं.
नई दिल्ली: स्विट्जरलैंड में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियरों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अनोखा प्रयोग शुरू किया है. इस प्रयोग में उस भेड़ की ऊन का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है. पश्चिमी स्विट्जरलैंड के त्सानफ्लूरॉन ग्लेशियर पर वैज्ञानिकों ने ऊन से बनी दो चादरें बिछाई हैं. उनका मकसद यह पता लगाना है कि क्या प्राकृतिक ऊन गर्मियों में ग्लेशियर की बर्फ को पिघलने से बचा सकती है.
ग्लेशियरों को तेज धूप और गर्मी से बचाने के लिए कई जगह पहले से खास सिंथेटिक चादरों का इस्तेमाल किया जाता है. ये चादरें सूरज की रोशनी को वापस भेजती हैं और बर्फ तक पहुंचने वाली गर्मी को कम करती हैं. इससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार कम होती है. हालांकि, सिंथेटिक चादरें प्लास्टिक से बनी होती हैं और इनके इस्तेमाल से पर्यावरण में छोटे प्लास्टिक रेशे यानी माइक्रोफाइबर पहुंचने की चिंता रहती है.
क्या है वैज्ञानिकों का उद्देश्य?
इसी वजह से वैज्ञानिक अब ऊन जैसे प्राकृतिक विकल्प को आजमा रहे हैं. यह प्रयोग Keep It Wool प्रोजेक्ट के तहत किया जा रहा है. इस परियोजना में समिट फाउंडेशन और यूनिवर्सिटी ऑफ लौसाने मिलकर काम कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का एक उद्देश्य ग्लेशियरों की बर्फ को बचाना है, जबकि दूसरा मकसद स्विट्जरलैंड में बेकार जा रही भेड़ की ऊन का उपयोग करना है.
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जून में वैज्ञानिकों ने त्सानफ्लूरॉन ग्लेशियर के करीब 200 वर्ग मीटर हिस्से पर ऊन से बनी दो चादरें बिछाईं. इन चादरों को स्विट्जरलैंड की कंपनी फिसोलेन ने तैयार किया है. वैज्ञानिक पूरी गर्मियों के दौरान इन चादरों की तुलना सिंथेटिक चादरों से कर रहे हैं. टीम लगभग हर दो हफ्ते में जांच करती है कि दोनों प्रकार की चादरों के नीचे मौजूद बर्फ कितनी पिघली है.
शुरुआती जांच में क्या आया सामने?
इस प्रयोग के शुरुआती नतीजे वैज्ञानिकों के लिए उत्साहजनक बताए जा रहे हैं. शुरुआती जांच में ऊन की चादरों ने बर्फ को पिघलने से रोकने में सिंथेटिक चादरों के समान प्रदर्शन किया है. इसका मतलब है कि प्राकृतिक ऊन ने वैज्ञानिकों की उम्मीद से बेहतर परिणाम दिए हैं.
इस प्रयोग का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि स्विट्जरलैंड में भेड़ों से मिलने वाली काफी मात्रा में ऊन इस्तेमाल नहीं हो पाती. रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल करीब 40 से 70 फीसदी ऊन बेकार चली जाती है. अगर इस ऊन का इस्तेमाल ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए किया जा सके तो एक तरफ प्राकृतिक संसाधन का दोबारा उपयोग होगा और दूसरी तरफ प्लास्टिक आधारित विकल्पों पर निर्भरता कम हो सकती है.
हालांकि, यह अभी एक प्रयोग है और इससे यह तय नहीं हुआ है कि ऊन की चादरें बड़े स्तर पर ग्लेशियरों को बचाने का स्थायी समाधान बन सकती हैं. वैज्ञानिक आगे भी इसके प्रदर्शन, टिकाऊपन और पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन करेंगे. फिर भी बेकार मानी जाने वाली ऊन से ग्लेशियरों की बर्फ बचाने की कोशिश जलवायु संकट से निपटने के लिए एक दिलचस्प और प्राकृतिक विकल्प जरूर सामने लाती है.