नई दिल्ली: इस्लामाबाद इन दिनों वैश्विक राजनीति और जटिल कूटनीति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. ईरान और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाने की गंभीर कोशिश कर रहा है. इस भू-राजनीतिक सक्रियता का उसे बड़ा वित्तीय लाभ भी मिला है. सऊदी अरब ने हाल ही में पाकिस्तान को भारी कर्ज देकर उसकी डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है. हालांकि, यह मदद केवल एक अस्थायी मरहम की तरह है क्योंकि पाकिस्तान को जल्द ही अन्य देशों का पुराना कर्ज चुकाना है.
इस्लामाबाद में ईरान संकट पर चर्चा के लिए अंतरराष्ट्रीय मेज सजी है. वहां ईरान के प्रतिनिधि और विभिन्न दल कूटनीतिक समाधान तलाश रहे हैं. इस बीच पाकिस्तान के खाते में 1 अरब डॉलर की राशि क्रेडिट हुई है, जो पाकिस्तानी मुद्रा में 2 खरब 78 अरब रुपये के बराबर है. भू-राजनीतिक विशेषज्ञ इस रकम को केवल कर्ज नहीं, बल्कि ईरान वार्ता की मेजबानी का 'पुरस्कार' मान रहे हैं. इससे पाकिस्तान को दुनिया में अपनी कूटनीतिक अहमियत दिखाने का बड़ा मौका मिला है.
ठीक छह दिन पहले, 15 अप्रैल को सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 2 अरब डॉलर की सहायता राशि प्रदान की थी. पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब इसे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने वाला एक ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं
सऊदी ने 3 अरब डॉलर का नया कर्ज देने और पुराने 5 अरब डॉलर के कर्ज को 2028 तक रोलओवर करने का औपचारिक ऐलान किया है. इस तरह कुल 8 अरब डॉलर का पैकेज मिला है. लेकिन यह मदद केवल कुछ महीनों की किल्लत ही दूर करेगी.
पाकिस्तान की असली चिंता संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को चुकाए जाने वाले 3.5 अरब डॉलर का कर्ज है. यदि सऊदी अरब समय पर यह आर्थिक मदद नहीं देता, तो पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह खाली होने के कगार पर पहुंच जाता. मार्च महीने में पाकिस्तान यूएई के साथ इस कर्ज की अवधि बढ़ाने के समझौते में पूरी तरह विफल रहा था. अब सऊदी का यह पैसा पाकिस्तान के लिए जीवनदान बनकर आया है. हालांकि, यूएई को पैसा लौटाने के बाद भंडार पर दबाव फिर बढ़ेगा.
पाकिस्तान की रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ आयशा सिद्दीका का मानना है कि सरकार इन विदेशी दौरों का उपयोग केवल यह दिखाने के लिए कर रही है कि वह अलग-थलग नहीं है. जब तक देश में ठोस निवेश और निर्यात आधारित आर्थिक सुधार नहीं होंगे, तब तक यह कूटनीतिक सक्रियता संकट को स्थायी रूप से खत्म नहीं कर पाएगी. रेमिटेंस पर अत्यधिक निर्भरता और बार-बार मित्र देशों से कर्ज मांगना पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की एक पुरानी और खतरनाक आदत बन चुकी है.