Explainer: नेपाल की बाढ़ सिर्फ कुदरत का कहर नहीं! AI फेक वीडियो, कमजोर वॉर्निंग सिस्टम और पहाड़ों से छेड़छाड़ ने भी बढ़ाई मुसीबत
नेपाल में आई बाढ़ से कितना नुकसान हुआ है, ये तो किसी से छिपा नहीं है. इस घटना ने सिर्फ राहत और बचाव व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि क्या पहाड़ी इलाके इतने बड़ी आपदा के लिए तैयार हैं?
Nepal Flash Floods: नेपाल में आई भीषण बाढ़ से कितनी जिंदगियां तबाह हुई हैं, इसका अंदाजा लगाने जाएं तो तस्वीर काफी भयावह नजर आती है. इसका तबाही ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि प्राकृतिक आपता कितनी तेजी से बड़ी तबाही में बदल सकती है. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ से हिमनद का एक बड़ा हिस्सा टूटने के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में अचानक पानी और मलबे का सैलाब आ गया. देखते ही देखते पानी के साथ बड़े-बड़े पत्थर, कीचड़ और पेड़ बहने लगे.
इस आपदा का सबसे ज्यादा असर रसुवा जिले के तिमुरे और स्याब्रूबेसी जैसे इलाकों में देखने को मिला. कई घर और सड़के बहर गईं, पुल टूट गए, लोग लापता हो गए और जानें कितनी गईं इसकी गिनती अब तक जारी है. इस घटना ने सिर्फ राहत और बचाव व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं बल्कि यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि क्या पहाड़ी इलाके इतने बड़ी आपदा के लिए तैयार हैं?
जब बाढ़ के साथ कई खतरे एक साथ आए, तो क्या हो?
पहाड़ी इलाकों में अगर बाढ़ आ जाए तो वो इतनी बड़ी आपदा बनकर उभरती है कि लोगों को जीवन तहस-नहस हो जाता है. बाढ़ के साथ हिमनद टूटना, भूस्खलन और मलबे का तेज बहाव जुड़ जाए तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है. इस तरह की आपदा में लोग सुरक्षित जगहों पर बहुत कम ही पहुंच पाते हैं. आमतौर पर मौसम विभाग हर
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ऐसी आपदा में लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिलता है. सामान्य तौर पर मौसम विभाग बारिश या बाढ़ की चेतावनी जारी कर सकता है, लेकिन अचानक ग्लेशियर टूटने के बाद आने वाले मलबे के सैलाब का अंदाजा लगाना काफी मुश्किल होता है. यह वजह है कि विशेषज्ञ अब ऐसी वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत पर जोर दे रहे हैं, जो न सिर्फ बारिश या नदी का जलस्तर बढ़ने की जानकारी न दे, बल्कि खतरों के एक साथ आने की संभावना को भी आसानी से समझ सके.
क्या केवल चेतावनी देना काफी है?
मान लीजिए किसी गांव में बाढ़ की चेतावनी दे दी गई, लेकिन लोगों को यह नहीं पता है कि उन्हें कहां जाना है, कौन-सा रास्ता सही है और किस रास्ते पर खतरा कितनी देर में पहुंचेगा? तो क्या लोग अपनी जान बचा पाएंगे. देखा जाए तो ऐसी स्थिति में चेतावनी मिलने के बावजूद जान बचाना मुश्किल हो सकता है. जो टीमें राहत-बचाव कार्य करती हैं, उनके लिए यह जानकारी होना बेहद जरूरी होता है कि कौन-से रास्ते सुरक्षित हैं, लोगों को कहां पहुंचाना है और किस तरह की डिवाइसेज की जरूरत पड़ेगी.
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि केवल फोन पर अलर्ट भेज देना या फिर सायरन बजा देना काफी नहीं है. अर्ली वार्निंग सिस्टम के साथ स्थानीय स्तर पर तैयारी और नियमित अभ्यास भी जरूरी है.
टेलिकम्यूनिकेशन सिस्टम बंद होने से बढ़ी परेशानी:
इन सब से अलग एक और बड़ी समस्या है, जिसका निवारण करना जरूरी हो जाता है. आपदा आने के बाद कई इलाकों में टेलीकॉम नेटवर्क और दूसरी सुविधाएं ठप हो गईं. इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा जिनके अपने लोग लापता थे. किसी को ये पता ही नहीं चल पाता है कि उनके परिवार के सदस्या कहां हैं. वहीं, दूसरी तरफ अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग आंकड़े सामने आने लगते हैं, जिससे चिंता और कंफ्यूजन दोनों ही बढ़ जाती है.
सरकारी एजेंसियों, पुलिस और स्थानीय प्रशासन की सूचनाओं में अंतर होने से लोगों की परेशानी और बढ़ गई. बड़ी आपदा के समय सही और एक जैसी जानकारी उपलब्ध कराना राहत और बचाव जितना ही महत्वपूर्ण काम है.
AI ने बढ़ाया फेक न्यूज का खतरा:
इस त्रासदी के बीच तकनीक का एक दूसरा और चिंताजनक चेहरा भी सामने आया. AI फेक न्यूज… यह एक ऐसा खतरा बनकर उभर रहा है, जो लोगों को किसी भी स्थिति में कंफ्यूज करने के लिए अकेला ही काफी है. कई लोग इस आपदा को पुरानी आपदा से जोड़कर गलत खबरें फैला रहे हैं, जिससे वास्तविक बचाव कार्य भी कई बार प्रभावित हो जाता है. कोई परिवार अगर गलत वीडियो देखकर किसी जगह को ज्यादा खतरनाक समझ ले या किसी फर्जी सूचना पर भरोसा कर ले, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है.
जलवायु परिवर्तन भी बड़ी वजह:
जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ी वजह है इस तरह की आपदा के लिए.हिमालयी क्षेत्र तेजी से गर्म हो रहा है. तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों में बदलाव हो रहा है और कुछ इलाकों में हिमनद झीलों का खतरा भी बढ़ रहा है. जब बर्फ और ग्लेशियर तेजी से कमजोर होते हैं तो पहाड़ी ढलानों की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में भारी बारिश या दूसरे प्राकृतिक कारण बड़े हादसे को जन्म दे सकते हैं.
पहाड़ों पर बढ़ता निर्माण भी चिंता की वजह:
यह तो किसी से भी छिपा नहीं है कि नेपाल और हिमालय के दूसरे इलाकों में सड़क, होटल, बिजली परियोजनाओं और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का निर्माण काफी तेजी से हो रहा है और पहले भी हो चुका है. विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति से खिलवाड़ करना बेहद ही खतरनाक हो सकता है. सड़कों के लिए पहाड़ काटना, पेड़ों की कटाई आदि आगे चलकर काफी मुश्किलें पैदा कर सकती हैं. इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है.
क्या है बड़ा सवाल:
नेपाल की बाढ़ से एक बात साफ है कि मॉर्डन डिजास्टर मैनेजमेंट सिर्फ बांध, सड़क और पुल बनाने तक सीमित नहीं रह सकता. सटीक जानकारी, फास्ट कम्यूनिकेशन, मजबूत वॉर्निंग सिस्टम और स्थानीय लोगों की ट्रेनिंग भी उतनी ही जरूरी है. सरकारों को ऐसे सिस्टम पर निवेश करना होगा जो ग्लेशियर टूटने से लेकर बाढ़, भूस्खलन और मलबे के बहाव तक कई खतरों को एक साथ पहचान सके. साथ ही, आपदा के समय सोशल मीडिया पर कंट्रोल भी जरूरी है.