दिल्ली में BRICS समिट के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी नेताओं और मेहमानों के लिए डिनर की मेजबानी की. इसी दौरान BRICS और NATO की वैश्विक ताकत को लेकर चर्चा भी तेज हो गई. हालांकि, दोनों समूहों की सीधी तुलना करना आसान नहीं है, क्योंकि नाटो एक सैन्य गठबंधन है, जबकि ब्रिक्स आर्थिक, राजनीतिक और विकास से जुड़े सहयोग का मंच है.
नाटो के सदस्य सामूहिक रक्षा व्यवस्था के तहत काम करते हैं. वहीं ब्रिक्स देशों की अपनी स्वतंत्र विदेश और रक्षा नीतियां हैं. ऐसे में सैन्य संघर्ष की स्थिति में ब्रिक्स का एकजुट होकर नाटो जैसी सैन्य प्रतिक्रिया देना फिलहाल संभव नहीं माना जाता.
सैन्य खर्च के मामले में नाटो काफी आगे है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नाटो देशों का संयुक्त रक्षा खर्च 1.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है. इसमें अकेले अमेरिका करीब 935 बिलियन डॉलर खर्च करता है. इसके मुकाबले ब्रिक्स देशों का कुल रक्षा खर्च लगभग 480 बिलियन डॉलर है. इस आर्थिक बढ़त की वजह से नाटो के पास अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों, सैन्य तकनीक, खुफिया नेटवर्क और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सैन्य तैनाती के लिए ज्यादा संसाधन उपलब्ध हैं.
रक्षा बजट में पीछे होने के बावजूद सैन्य जनशक्ति के मामले में ब्रिक्स मजबूत है. ब्रिक्स देशों के पास 50 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक हैं. चीन, भारत और रूस की बड़ी सेनाएं इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इसके मुकाबले नाटो के 32 सदस्य देशों के पास करीब 33 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी हैं. यानी सैनिकों की संख्या के मामले में ब्रिक्स को स्पष्ट बढ़त हासिल है.
परमाणु क्षमता की बात करें तो दोनों समूहों के बीच अंतर बहुत ज्यादा नहीं है. रूस, चीन और भारत के पास कुल मिलाकर 6,000 से ज्यादा परमाणु हथियार बताए जाते हैं. वहीं नाटो के तीन परमाणु हथियार संपन्न सदस्य अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन मिलकर 5,800 से ज्यादा परमाणु हथियार रखते हैं. हालांकि परमाणु ताकत केवल हथियारों की संख्या से तय नहीं होती. मिसाइल तकनीक, परमाणु पनडुब्बियां और हथियारों की तैनाती की क्षमता भी इसमें अहम भूमिका निभाती है.
आधुनिक युद्ध क्षमता में नाटो को महत्वपूर्ण बढ़त हासिल है. उसके पास बड़ी संख्या में अत्याधुनिक लड़ाकू विमान, मजबूत इंटेलिजेंस और सर्विलांस सिस्टम तथा एयरक्राफ्ट कैरियर जैसी नौसैनिक क्षमताएं हैं. वहीं ब्रिक्स देशों की ताकत जमीनी युद्ध क्षमता में ज्यादा दिखाई देती है. चीन, रूस और भारत के पास बड़ी संख्या में टैंक, बख्तरबंद वाहन और तोपखाने मौजूद हैं.
आर्थिक शक्ति का आकलन किस पैमाने से किया जाता है, इससे तस्वीर बदल जाती है. नॉमिनल GDP के आधार पर नाटो देशों को बढ़त हासिल है. इसमें अमेरिका की विशाल अर्थव्यवस्था और डॉलर की वैश्विक भूमिका सबसे बड़ा योगदान देती है.
लेकिन PPP यानी खरीद क्षमता के आधार पर ब्रिक्स काफी मजबूत है. इस पैमाने पर ब्रिक्स देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का करीब 40 फीसदी हिस्सा रखते हैं. इसके अलावा समूह के पास दुनिया की बड़ी आबादी के साथ तेल, प्राकृतिक गैस और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों का विशाल आधार भी है.