बांग्लादेश की राजनीति में गुरुवार को बड़ा बदलाव हुआ. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के पूर्व महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर देश के 23वें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. जातीय संसद में हुए चुनाव में उन्हें 255 वोट मिले. उनके मुकाबले विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवार ओली अहमद को 88 मत प्राप्त हुए. राष्ट्रपति चुनाव में जीत के बाद आलमगीर ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की जिम्मेदारी संभालने की दिशा में कदम बढ़ाया है.
इस चुनाव की सबसे खास बात यह रही कि करीब 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव में एक से अधिक उम्मीदवार आमने-सामने थे. पिछले कई चुनावों में विपक्षी दलों ने उम्मीदवार नहीं उतारे थे, जिसके चलते मुकाबला लगभग एकतरफा रहा. इस बार BNP ने आलमगीर को मैदान में उतारा, जबकि ओली अहमद को दक्षिणपंथी जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के नेतृत्व वाले 11 दलों के विपक्षी गठबंधन का समर्थन मिला.
DHAKA : Mirza Fakhrul Islam Alamgir has been elected Bangladesh’s 23rd President in a contested parliamentary vote—the first competitive presidential election in 35 years.
— Subodh Kumar (@kumarsubodh_) August 20, 2026
PM Tarique Rahman congratulated him on his election. pic.twitter.com/rjzEWBr2GY
राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया मुख्य चुनाव आयुक्त ASM नासिर उद्दीन की निगरानी में पूरी हुई. मतदान दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक चला. संसद के कुल 349 सदस्यों में से 343 ने मतदान किया. इसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ने परिणाम घोषित करते हुए आलमगीर को विजेता बताया. बांग्लादेश में राष्ट्रपति का चुनाव जनता सीधे नहीं करती, बल्कि संसद सदस्य मतदान के जरिए राष्ट्रपति चुनते हैं.
राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने से पहले आलमगीर BNP के महासचिव और पार्टी की राष्ट्रीय स्थायी समिति के सदस्य थे. पार्टी ने पिछले सप्ताह उनके नाम की घोषणा की थी. उम्मीदवार बनने के बाद उन्होंने संगठन के दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया. BNP के वरिष्ठ संयुक्त महासचिव रूहल कबीर रिजवी ने पार्टी की बैठक के बाद उनके नामांकन की जानकारी दी थी. बताया गया कि यह फैसला पार्टी नेतृत्व के साथ चर्चा के बाद लिया गया.
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बांग्लादेश की सत्ताधारी पार्टी BNP के वरिष्ठ नेताओं में रहे हैं. लंबे समय तक उन्होंने पार्टी के महासचिव की जिम्मेदारी संभाली और संगठन के राजनीतिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. राष्ट्रपति पद के लिए नाम तय होने के बाद उनका राजनीतिक करियर एक नए संवैधानिक दायित्व की ओर बढ़ गया. अब उनकी भूमिका पार्टी की सक्रिय राजनीति से अलग देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर केंद्रित होगी.
राष्ट्रपति चुनाव की जरूरत मोहम्मद शहाबुद्दीन के पद छोड़ने के बाद पड़ी. उन्होंने पिछले महीने गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था. 350 सदस्यीय जातीय संसद में एक सीट पर चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण 349 सदस्य मतदान के पात्र थे. इनमें से 343 सांसदों ने वोट डाला. कार्यवाहक राष्ट्रपति और संसद अध्यक्ष मेजर (सेवानिवृत्त) हाफिज उद्दीन अहमद समेत कई प्रमुख नेताओं ने भी मतदान किया.