नई दिल्ली: खाड़ी क्षेत्र में एक बार फिर युद्ध की आहट सुनाई दे रही है. इराक और कुवैत के बीच समुद्री सीमा को लेकर उपजा पुराना विवाद अब संयुक्त राष्ट्र (UN) की दहलीज तक जा पहुंचा है. इसी महीने इराक ने संयुक्त राष्ट्र में एक नया नक्शा और अपनी भौगोलिक चौहद्दी जमा की है, जिसमें उसने फारस की खाड़ी में अपनी समुद्री सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की है. इराक का दावा है कि यह नक्शा खोर अब्दुल्ला जलमार्ग और आसपास के क्षेत्रों में उसकी क्षेत्रीय जलसीमा को स्पष्ट करता है.
इराक के इस कदम पर कुवैत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. कुवैत का कहना है कि इराकी नक्शे में फिश्त अल-कैद और फिश्त अल-ईज जैसे छोटे द्वीपों और उथले क्षेत्रों को इराकी क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है, जो सीधे तौर पर उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है. कुवैत के अनुसार, ये क्षेत्र हमेशा से उसी के रहे हैं और कभी विवादित नहीं रहे. इस तकरार ने 1990 की उन यादों को ताजा कर दिया है जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत के तेल भंडारों पर कब्जा करने के इरादे से हमला किया था. तब अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 'ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म' के जरिए इराक को पीछे हटने पर मजबूर किया था.
इराक और कुवैत के बीच खोर अब्दुल्ला जलमार्ग को लेकर संघर्ष दशकों पुराना है. हालांकि 2012 में दोनों देशों के बीच इस जलमार्ग के नियमन के लिए एक समझौता हुआ था, लेकिन 2023 में इराक के सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया. इराकी सांसदों का तर्क था कि यह समझौता संसदीय प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया था और यह इराक की संप्रभुता के खिलाफ है. दूसरी ओर, इराक ने कुवैत पर भी आरोप लगाया है कि उसने 2014 में बिना सलाह के नक्शे जमा किए और 2019 में एक बंदरगाह बनाकर इलाके का भूगोल बदलने की कोशिश की.
इस विवाद में कुवैत के पड़ोसी देश कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान उसके समर्थन में उतर आए हैं. सऊदी अरब ने भी इस नक्शे पर 'गंभीर चिंता' व्यक्त करते हुए कहा कि यह सऊदी-कुवैत संयुक्त क्षेत्रों में भी हस्तक्षेप करता है. गौर करने वाली बात यह है कि यह संकट ऐसे समय में पैदा हुआ है जब इस क्षेत्र का सबसे बड़ा रणनीतिक खिलाड़ी, अमेरिका, पूरी तरह से ईरान के साथ जारी तनातनी में उलझा हुआ है.