सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान के रक्षा समझौते में ईरान की एंट्री? तेहरान को मिला न्योता! मिडिल ईस्ट में बदलेगा समीकरण

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते के बाद मिडिल ईस्ट की राजनीति में हलचल बढ़ गई है. अब दावा किया जा रहा है कि ईरान को भी इस समझौते में शामिल होने का न्योता दिया गया है.

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Shanu Sharma

अंतरराष्ट्रीय राजनीति इस समय अपने सबसे अस्थिर दौर से गुजर रही है. ईरान और अमेरिका में तनाव चल रहा है, वहीं रूस और यूक्रेन में भी तनाव कम होता नजर नहीं आ रहा है. हालांकि इस अस्थिर दौर के बीच सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक ऐसा समझौता किया है, जो भविष्य में उनकी रक्षा करेगा.

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौता किया गया है. यह समझौता काफी हद तक नाटो से मिलता है. जिसमें कहा गया है कि अगर इन तीनों देशों में से किसी भी देश पर हमला होता है तो उस हमले को तीनों के खिलाफ माना जाएगा. अब इन सब के बीच एक नई खबर सामने आई है. कहा जा रहा है कि अब इस समझौते में शामिल होने के लिए ईरान को भी न्योता भेजा गया है.

ईरान के अधिकारी का बड़ा दावा

ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बेरूत स्थित एक न्यूज चैनल से बात करते हुए इस बात का दावा किया है. उन्होंने यह भी कहा कि तेहरान अब इस प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, कोई भी फाइनल फैसला नहीं लिया गया है. हालांकि इस दावे की पुष्टि फिलहाल न तो ईरान के किसी वरिष्ठ अधिकारी और न ही किसी मंत्रालय की ओर से की गई है. लेकिन माना जा रहा है कि अगर यह समझौता होता है तो यह मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति को पूरी तरह से पलट सकता है. हालांकि ईरानी अधिकारी ने इस प्रस्ताव को तेहरान की जीत बताई है. क्योंकि वह काफी लंबे समय से ऐसे समझौते करने के प्रयास में लगा था. जो अब सामने आता नजर आ रहा है.


समझौते में जुड़ सकते हैं नए देश

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा युद्ध एक अलग स्तर पर पहुंच चुका है. हालांकि रिपोर्ट में यह भी दावा किया जा रहा है कि अमेरिका को इस युद्ध में काफी नुकसान उठाना पड़ा है, वहीं ईरान अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है. ईरान लगातार अपने हथियार बना रहा है. अब ऐसे समय में अगर यह समझौता होता है तो समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं.

आपको बता दें कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच इस समझौते पर 7 अगस्त को हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के बाद एक संयुक्त बयान में कहा गया कि इसका उद्देश्य हमारे खिलाफ हुए किसी भी हमले के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है. हालांकि साथ में यह भी कहा गया कि इस समझौते में और भी देश शामिल हो सकते हैं. जिसके बाद मिस्र और बांग्लादेश ने भी अपनी रुचि दिखाई है.