होर्मुज स्ट्रेट बना ईरान का सबसे बड़ा हथियार, क्या अमेरिका-ईरान जंग से हिल जाएगी वैश्विक अर्थव्यवस्था?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. दोनों देशों के बीच पहले हुआ समझौता अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है. होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण, सैन्य तैयारियां और रणनीतिक दबाव इस टकराव को नए स्तर पर ले जा रहे हैं.

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Shanu Sharma

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव एक बार फिर गहरा होता दिखाई दे रहा है. दोनों देशों के बीच पहले हुआ समझौता उस समय की रणनीतिक परिस्थितियों और शक्ति संतुलन पर आधारित था, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. 

अमेरिका जहां क्षेत्र में अपना प्रभाव फिर मजबूत करना चाहता है, वहीं ईरान अपनी मौजूदा रणनीतिक स्थिति को बनाए रखने के लिए हर संभव कदम उठाने की तैयारी में है. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच टकराव की आशंका फिर बढ़ गई है.

युद्ध के बाद बदला रणनीतिक समीकरण

इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से सैन्य अभियान चलाया था. उसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करना था. हालांकि घटनाक्रम अमेरिका की उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा. संघर्ष के दौरान होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की पकड़ मजबूत हुई, जिससे उसे रणनीतिक बढ़त मिली. इसके बाद दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, लेकिन ईरान ने शुरुआत से ही इसे स्थायी समाधान नहीं माना.


ईरानी नेतृत्व का मानना है कि यह समझौता केवल अस्थायी राहत देने के लिए किया गया था. उसके अनुसार अमेरिका इसका उपयोग अपनी आर्थिक और सैन्य तैयारियों को मजबूत करने के लिए कर रहा है. ईरान की आशंकाएं उस समय और बढ़ गईं जब अमेरिकी नेतृत्व की ओर से यह संकेत मिला कि समझौते से अमेरिका को अपने रणनीतिक तेल भंडार को फिर से भरने का समय मिलेगा. ईरान का यह भी आरोप है कि उसकी जब्त संपत्तियां अब तक बहाल नहीं की गई हैं. इसके अलावा क्षेत्रीय समझौतों में उसकी प्रमुख मांगों को महत्व नहीं दिया गया तथा खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ाई जा रही है.

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा रणनीतिक हथिया

विश्लेषकों के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट इस पूरे विवाद का सबसे अहम केंद्र बन चुका है. दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. ईरान का मानना है कि इस क्षेत्र पर उसकी मजबूत पकड़ भविष्य में होने वाली किसी भी बातचीत में उसकी सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकती है. इसी कारण वह इस मुद्दे पर किसी तरह का समझौता करने के पक्ष में नहीं है.

तनाव के बीच ओमान के तट के पास तेल टैंकरों पर हमले की घटनाओं ने हालात और गंभीर बना दिए. इन घटनाओं के बाद अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई तेज कर दी, जबकि ईरान ने भी अपने रुख में नरमी के कोई संकेत नहीं दिए. दोनों देशों की बढ़ती सैन्य गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि स्थिति तेजी से संवेदनशील होती जा रही है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो इसका सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट, बाब अल मंदेब और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में किसी भी तरह का व्यवधान तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या फिर यह तनाव एक बड़े सैन्य संघर्ष में बदल जाता है.