उबल रहा इटली-फ्रांस: मुस्लिम नेता ने की थी यूरोप की बर्बादी की भविष्यवाणी, 9 साल बाद क्या हो गई सच?

फ्रांस और इटली की सड़कों पर उमड़ा जनआक्रोश महंगाई और शिक्षा की शिकायतों से शुरू हुआ. अब इसे यूरोप के पुराने सांस्कृतिक तनावों से जोड़कर देखा जा रहा है.

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Reepu Kumari

Italy-France Protests: यूरोप के दो बड़े देश फ्रांस और इटली इन दिनों सड़कों पर उबलते गुस्से का सामना कर रहे हैं. एक हफ्ते के भीतर हुए प्रदर्शनों में महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली को मुख्य वजह बताया गया. मगर कई जानकारों का मानना है कि यह नाराजगी सिर्फ आज के मुद्दों तक सीमित नहीं है. उनके मुताबिक इसके पीछे सामाजिक और सांस्कृतिक तनाव की वह पुरानी चिंगारी है, जो बरसों से धीरे-धीरे सुलग रही थी और अब किसी बहाने से भड़क उठी है.

इस बहस को हवा तब मिली, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के प्रदर्शनों पर टिप्पणी की. उनका कहना था कि यह मामला सिर्फ स्कूलों का नहीं है, बल्कि बेकाबू माइग्रेशन और इस्लाम के जरिए एक महान देश पर कब्जे की कोशिश है. 

नौ साल पहले दी गई चेतावनी

यह बयान यूएई के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल-नहयान का है. उन्होंने 2017 में यूरोप को आगाह किया था कि 'पॉलिटिकली करेक्ट' बने रहने और सही फैसले न लेने की कीमत उसे चुकानी पड़ेगी. उनके मुताबिक आने वाले समय में सबसे ज्यादा रेडिकल, चरमपंथी और आतंकवादी यहीं से निकल सकते हैं. उन्होंने यूरोपीय देशों को आतंक का इनक्यूबेटर बनने से बचने की सलाह दी थी. आज उनके शब्द कई लोगों को भविष्यवाणी जैसे लगते हैं.


फ्रांस में 5.5 लाख लोग, 400 गिरफ्तारियां

फ्रांस में 17 अक्टूबर को करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे. इनमें किसान, क्लाइमेट वालंटियर, ट्रेड यूनियन और छात्र शामिल थे. ईंधन की कीमतें, महंगाई और शिक्षा की खराब हालत मुख्य मुद्दे रहे, पर कई जगह प्रदर्शन हिंसक हो गए. गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के अनुसार करीब 400 गिरफ्तारियां हुईं और 60 सुरक्षाकर्मी घायल हुए. मार्सेय, लिली, कैले और एंजे के नगर भवनों पर हमले हुए. राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि हिंसा की कोई जगह नहीं है.

इटली में पत्थर, हथौड़े और बंद स्टेशन

इटली में भी हालात अलग नहीं रहे. प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी की सरकार के खिलाफ छात्र, शिक्षक और ट्रेड यूनियन सड़कों पर उतरे. रोम, मिलान, ट्यूरिन और बोलोन्या में प्रदर्शन हुए. कुछ जगहों पर पुलिस पर पत्थर फेंके गए, अधिकारी घायल हुए और तोड़फोड़ हुई. मिलान में प्रोटेस्ट बीच में रोकना पड़ा, ट्यूरिन में हथौड़े लिए लोगों को रोका गया और बोलोन्या में रेलवे स्टेशन बंद करना पड़ा. मेलोनी ने शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान किया, पर हिंसा बर्दाश्त न करने की चेतावनी दी.

टाइमिंग पर उठते सवाल

इन प्रदर्शनों की टाइमिंग पर भी ध्यान जा रहा है. इटली की मेलोनी सरकार ने हाल ही में स्कूलों में बुर्का और नकाब जैसे चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर रोक का कानून पास किया है. विदेशी छात्रों की संख्या पर सीमा और इटैलियन भाषा सीखना अनिवार्य करने के प्रावधान भी जोड़े गए हैं. फ्रांस में 2010 से सार्वजनिक जगहों पर चेहरा ढकना प्रतिबंधित है. सवाल यही है कि क्या यह गुस्सा केवल स्थानीय मुद्दों पर है, या ऐसी नीतियां आते ही विरोध तेज हो जाता है?