रूस से तेल खरीदने पर भी भारत को टैरिफ में क्यों मिली राहत? मार्को रुबियो ने बताई वजह
अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंधों और टैरिफ से 60 दिनों की राहत दी है.
अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रतिबंधों और टैरिफ के प्रावधानों में 60 दिनों की राहत दी है. विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि इस दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था, अमेरिकी हितों और भारत जैसे सहयोगी देशों की ऊर्जा जरूरतों पर फैसले के असर का आकलन किया जाएगा.
रूस पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका ने क्यों दी राहत?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट यानी ग्राहम एक्ट के कुछ प्रमुख प्रावधानों पर 60 दिनों की छूट दी. इस कानून के तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दंडात्मक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया था. इससे भारत को भी राहत मिली है, क्योंकि वह रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शनिवार शाम वॉशिंगटन के पास जॉइंट बेस एंड्रयूज पर पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति इस अवधि का इस्तेमाल प्रतिबंधों और टैरिफ के संभावित प्रभावों का आकलन करने के लिए करना चाहते हैं. रुबियो छह दिवसीय दौरे पर उज्बेकिस्तान और भारत रवाना हो रहे थे.
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वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर का होगा आकलन
रुबियो के मुताबिक, अमेरिका को यह समझने के लिए समय चाहिए कि रूस पर प्रतिबंध लगाने और रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव और दुनिया में जारी संघर्षों को देखते हुए सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी है.
ट्रंप की ओर से जारी कार्यकारी आदेश के मुताबिक, यह छूट तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री, जरूरत के अनुसार वित्त मंत्री और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से सलाह लेकर, आगे कार्रवाई जरूरी नहीं मान लेते.
ट्रंप ने फैसले को बताया अमेरिका के हित में
ट्रंप ने मियामी के पास अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में पत्रकारों से बातचीत के दौरान फैसले का बचाव किया. उन्होंने कहा कि यह निर्णय अमेरिका के लिए अच्छा साबित होगा और इसका वैश्विक स्तर पर भी सकारात्मक असर हो सकता है. हालांकि, उन्होंने फैसले के विस्तृत आर्थिक प्रभावों को लेकर कोई स्पष्ट आकलन पेश नहीं किया.
रुबियो बोले- भारत अमेरिका का अहम सहयोगी
रुबियो ने कहा कि ग्राहम एक्ट में छूट का प्रावधान इसलिए रखा गया था, ताकि प्रशासन बदलती वैश्विक परिस्थितियों को समझने के लिए समय ले सके. उन्होंने ईरान युद्ध, सऊदी अरब में हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि इन घटनाओं का वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ रहा है.
रुबियो ने कहा कि भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन वह अब भी रूस से काफी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है. उनके मुताबिक, किसी देश के लिए एक दिन में अपने ऊर्जा आयात के स्रोत बदलना आसान नहीं होता.
उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार बताया. रुबियो सोमवार को भारत पहुंचने वाले हैं. उन्होंने कहा कि प्रशासन को यह तय करने के लिए अतिरिक्त समय चाहिए कि मौजूदा परिस्थितियों में कौन-से कदम उचित होंगे.
रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसदों ने फैसले की आलोचना की
ट्रंप के फैसले पर रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों दलों के कुछ सांसदों ने आपत्ति जताई है. ग्राहम एक्ट को पिछले महीने अमेरिकी सीनेट में 86 के मुकाबले 11 वोटों से मंजूरी मिली थी.
रिपब्लिकन सीनेटर डार्लिन ग्राहम ने कहा कि वह रूस पर दबाव बनाए रखने के पक्ष में हैं, ताकि युद्ध खत्म हो और ईंधन की कीमतें कम हों. उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और रूस पर भरोसा नहीं होने की बात भी कही.
रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने सोशल मीडिया पर फैसले को बेहद गैर-जिम्मेदाराना बताया. उन्होंने सवाल उठाया कि जब कानून को सीनेट में व्यापक समर्थन मिला था, तो प्रशासन उसके प्रावधानों में राहत क्यों दे रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को रूस पर दबाव कम करने के बजाय ईरान युद्ध से जुड़े संकट को सुलझाने पर ध्यान देना चाहिए.
टेक्सास के रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कॉर्निन ने भी फैसले का विरोध किया. उन्होंने कहा कि दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम इस निर्णय से बेहद नाराज होते. वहीं, मैसाचुसेट्स की डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने ट्रंप पर कांग्रेस की अनदेखी करने और रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने का अवसर देने का आरोप लगाया. उन्होंने सांसदों से फैसले को पलटने के लिए कदम उठाने की अपील की.
भारत की ऊर्जा जरूरतें बनीं अहम मुद्दा
अमेरिका का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब प्रशासन रूस के ऊर्जा निर्यात पर प्रतिबंधों के असर और दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरतों का एक हिस्सा रूसी तेल और गैस से पूरा करते हैं, इस बहस में महत्वपूर्ण हैं. अगले 60 दिनों में यह स्पष्ट हो सकता है कि अमेरिका आगे प्रतिबंधों और टैरिफ को लेकर क्या रुख अपनाता है.