नई दिल्ली: बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर संवैधानिक संकट के बादल गहराते नजर आ रहे हैं. राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने अंतरिम सरकार के पूर्व मुख्य सलाहकार, प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन पर संस्थागत समन्वय की उपेक्षा करने और राष्ट्रपति पद की गरिमा को जानबूझकर ठेस पहुंचाने के सनसनीखेज आरोप लगाए हैं. बंगाली दैनिक ‘कालेर कंठो’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में राष्ट्रपति ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कई चौंकाने वाले खुलासे किए.
राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने स्पष्ट रूप से दावा किया कि मुख्य सलाहकार ने संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना की है. उन्होंने कहा-'संविधान के अनुसार विदेश यात्रा से लौटने के बाद मुख्य सलाहकार को राष्ट्रपति से मिलकर लिखित सूचना देनी चाहिए. यूनुस ने 14-15 बार विदेश यात्राएं कीं, लेकिन एक बार भी मुझे सूचित करना उचित नहीं समझा.' राष्ट्रपति ने आगे आरोप लगाया कि अमेरिका के साथ हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य समझौते की जानकारी भी उनसे छिपाई गई, जो कि राज्य के प्रमुख होने के नाते उनका संवैधानिक अधिकार था.
साक्षात्कार के दौरान राष्ट्रपति का दर्द साफ झलक रहा था जब उन्होंने बताया कि कैसे रातों-रात बांग्लादेशी दूतावासों से उनकी तस्वीरें हटा दी गईं. उन्होंने इसे अपनी पदच्युति की दिशा में पहला कदम बताया. उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि कोसोवो और कतर जैसे देशों से आए निमंत्रणों को उनकी व्यस्तता का झूठा हवाला देकर बिना उनसे पूछे ही ठुकरा दिया गया. उन्होंने सवाल उठाया- 'क्या संविधान के तहत राष्ट्रपति इतना व्यस्त रहता है कि उसे पूछा तक न जाए?'
शहाबुद्दीन ने यह भी खुलासा किया कि उन्हें पद से हटाने के लिए निरंतर राजनीतिक और संस्थागत दबाव बनाया गया. एक समय तो पूर्व मुख्य न्यायाधीश को असंवैधानिक तरीके से राष्ट्रपति बनाने तक की योजना तैयार कर ली गई थी. 22 अक्टूबर 2024 को बंगभवन (राष्ट्रपति भवन) के घेराव का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि सेना ने तीन स्तर की सुरक्षा मुहैया कराकर स्थिति को संभाला था. उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था को बचाने के लिए सेना और बीएनपी नेताओं के सहयोग का आभार व्यक्त किया और जोर देकर कहा कि राष्ट्रपति संस्था को कमजोर करने वाली ताकतें अंततः नाकाम रहीं.