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पाकिस्तान की नई दोस्ती बांग्लादेश को इतिहास की उसी खाई में ले जाएगी! क्या हैं इस 'नापाक' प्रेम के मायने

पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकी के बीच बांग्लादेश एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है. इतिहास, आंतरिक विभाजन और क्षेत्रीय राजनीति की अनदेखी भविष्य में गंभीर संकट को जन्म दे सकती है.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
पाकिस्तान की नई दोस्ती बांग्लादेश को इतिहास की उसी खाई में ले जाएगी! क्या हैं इस 'नापाक' प्रेम के मायने
Courtesy: social media

नई दिल्ली: दक्षिण एशिया की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है. पाकिस्तान खुद को बदले हुए वैश्विक और क्षेत्रीय हालात में प्रासंगिक साबित करने की कोशिश कर रहा है, और इसी क्रम में उसकी नजर बांग्लादेश पर टिकी है. सत्ता परिवर्तन के बाद ढाका-इस्लामाबाद संबंधों में आई गर्मजोशी को कुछ लोग सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया मान रहे हैं, तो कुछ इसे खतरनाक संकेत के रूप में देख रहे हैं. सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश इतिहास से सबक ले रहा है, या वही गलतियां दोहराने की ओर बढ़ रहा है?

पाकिस्तान की बदली रणनीति और नया आत्मविश्वास

2025 पाकिस्तान के लिए रणनीतिक अलगाव से बाहर निकलने का वर्ष माना गया. अमेरिका के साथ रिश्तों में अप्रत्याशित सुधार, सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग और पश्चिम एशिया में नई भूमिका ने इस्लामाबाद को नया आत्मविश्वास दिया. इसी के साथ पाकिस्तान ने यह नैरेटिव गढ़ा कि उसने भारत के सामने मजबूती दिखाई. यही बदला हुआ मनोबल अब उसे बांग्लादेश में फिर से प्रभाव जमाने के लिए प्रेरित कर रहा है.

ढाका में सत्ता परिवर्तन और इस्लामाबाद की सक्रियता

2024 में अवामी लीग सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद पाकिस्तान ने मौके को पहचाना. एक दशक से जमे ठंडे रिश्तों को पिघलाने के प्रयास शुरू हुए. 2025 में पाकिस्तानी विदेश मंत्री का ढाका दौरा, सैन्य संपर्क, व्यापारिक बातचीत और सीधी उड़ानों की चर्चा इसी दिशा के संकेत हैं. यह गतिविधियां भले ही सीमित दिखें, लेकिन इनके राजनीतिक निहितार्थ गहरे हैं.

भारत की चिंता: इतिहास की परछाईं

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं बांग्लादेश फिर से पूर्वी पाकिस्तान जैसी राह पर न लौट जाए. शेख हसीना का लंबा शासन 1971 की भावना और भारत-बांग्लादेश सहयोग का प्रतीक रहा. कनेक्टिविटी, व्यापार और निवेश में इसका लाभ दोनों देशों को मिला. मौजूदा उथल-पुथल ने 1975 के बाद की अस्थिरता की यादें ताज़ा कर दी हैं, जिससे नई दिल्ली की बेचैनी बढ़ी है.

आंतरिक विभाजन और कट्टर ताकतों का उभार

बांग्लादेश की राजनीति में 1947 और 1971 की सोच का टकराव आज भी मौजूद है. धार्मिक और भाषाई राष्ट्रवाद के बीच संघर्ष अब और स्पष्ट हो रहा है. अल्पसंख्यकों पर हमले, भारत विरोधी बयानबाज़ी और इस्लामी संगठनों का बढ़ता प्रभाव स्थिति को जटिल बना रहा है. अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखना और भारत समर्थक स्वरों का कमजोर होना इस असंतुलन को और गहरा करता है.

इतिहास की चेतावनी और आगे का रास्ता

इतिहास सीधे उत्तर नहीं देता, लेकिन चेतावनी जरूर करता है. पाकिस्तान का विभाजन भी गलत धारणाओं और भय आधारित फैसलों का नतीजा था. बांग्लादेश के लिए जरूरी है कि वह किसी एक देश के विरोध या मोह में अंधा न हो. धैर्य, संतुलन और आत्मविश्वास के साथ बहुपक्षीय रिश्ते ही स्थिरता का रास्ता हैं. भारत के साथ संवाद बनाए रखना और सभी पक्षों को सुनना ही दीर्घकालिक हित में होगा.

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