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सऊदी अरब के चलते अमेरिका को लगने वाला है बड़ा झटका, जानें क्यों अचानक से BRICS देशों में तेज हो गई है सोने की खरीद

Petrodollar Deal of USA Saudi Arabia: पेट्रोडॉलर समझौता, शीत युद्ध के बाद के वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की एक आधारशिला माना जाता था. यह अनौपचारिक समझौता 1970 के दशक में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुआ था. इसमें 50 सालों के लिए सऊदी अरब अपने तेल व्यापार को अमेरिकी डॉलर में करने के लिए सहमत हुआ, और बदले में अमेरिका सऊदी अरब को सैन्य सुरक्षा प्रदान करता था.

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Petro Dollar Deal
Courtesy: IDL

Petrodollar Deal of USA Saudi Arabia: पेट्रोडॉलर समझौता, शीत युद्ध की परछाइयों में पनपा हुआ एक अनौपचारिक आर्थिक गठजोड़ था, जिसने दशकों तक वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) और अमेरिका के आर्थिक वर्चस्व को प्रभावित किया. इस समझौते के तहत, सऊदी अरब अगले 50 सालों तक अपने तेल व्यापार को अमेरिकी डॉलर में करने के लिए सहमत हुआ था जिसके बदले में, अमेरिका सऊदी अरब को सैन्य सुरक्षा प्रदान करता था और अरब क्षेत्र में उसके राजनीतिक हितों का समर्थन करता था.

हालांकि ये समझौता 9 जून 2024 को खत्म होने वाला है और अभी तक सऊदी अरब की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है जो ये बताए कि वो इस समझौते को रिन्यू करने वाले हैं. ऐसे में आइये एक नजर इस डील के चलते दोनों देशों को हुए फायदे और इस डील के रिन्यू न होने से होने वाले नुकसान पर डालते हैं.

अमेरिका के लिए लाभ: पेट्रोडॉलर प्रणाली ने अमेरिका को दो तरह से लाभ पहुंचाया. पहला, इसने डॉलर को दुनिया की आरक्षित करेंसी के रूप में मजबूत किया. इसका मतलब था कि अन्य देश अमेरिकी वित्तीय बाजारों में डॉलर रखना पसंद करते थे, जिससे अमेरिका को कम ब्याज दर पर ऋण प्राप्त करने में मदद मिली. दूसरा, पेट्रोडॉलर प्रणाली ने अमेरिका को सस्ते में तेल खरीदारी करने की अनुमति दी, जिसने उसकी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की.

सऊदी अरब के लिए लाभ: अमेरिका से सैन्य सुरक्षा प्राप्त करने के अलावा, सऊदी अरब को पेट्रोडॉलर प्रणाली से कई आर्थिक लाभ मिले. सबसे पहले, उसे अपने तेल की बिक्री से एक स्थिर करेंसी - अमेरिकी डॉलर प्राप्त हुआ. डॉलर की वैश्विक मांग ने सऊदी अरब को अपने तेल निर्यात से अधिकतम लाभ उठाने में सक्षम बनाया. दूसरा, पेट्रोडॉलर प्रणाली ने अमेरिकी वित्तीय बाजारों तक सऊदी अरब की पहुंच को आसान बना दिया, जहां वह अपने तेल राजस्व को सुरक्षित रूप से निवेश कर सकता था.

अब रिन्यू नहीं करेगी पेट्रोडॉलर डीलर

हालांकि, शीत युद्ध की समाप्ति और वैश्विक परिदृश्य में बदलाव के साथ, पेट्रोडॉलर प्रणाली पर दबाव बढ़ता गया है. इन बदलावों के चलते यह संभावना नहीं है कि भविष्य में पेट्रोडॉलर समझौते को औपचारिक रूप से रिन्यू किया जाएगा. हालांकि, दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक संबंध भविष्य में भी बने रहने की संभावना है. इतना ही नहीं ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों के बीच  पहले से ही डॉलर के अलावा बाकी करेंसीज में भी व्यापार ने तेजी से डॉलर को झटका दिया है, और उम्मीद है कि जल्द ही ये देश गोल्ड को आपस में व्यापार करने के लिए स्टैंडर्ड करेंसी के तौर पर अपना सकते हैं.

अब आइए समझते हैं कि ऐसा क्यों किया जा रहा है और इससे सोने की खरीद पर कैसे प्रभाव पड़ने वाला है.

डॉलर के वर्चस्व को चुनौती: शीत युद्ध के बाद, अमेरिका का वैश्विक प्रभाव कम हुआ है. चीन जैसी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं उभरी हैं, जो डॉलर के वैश्विक आरक्षित करेंसी के रूप में स्थिति को चुनौती दे रही हैं. ये देश वैश्विक व्यापार में डॉलर के अलावा अन्य करेंसीओं, जैसे युआन को बढ़ावा दे रहे हैं.

अमेरिका की कम होती निर्भरता: अमेरिका अब मध्य पूर्व से उतना अधिक तेल खरीदारी नहीं करता है, जितना वह पहले करता था. इसका एक कारण यह है कि उसने अपने स्वदेशी शेल तेल उत्पादन में वृद्धि की है. साथ ही, पवन और सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग दुनिया भर में बढ़ रहा है, जिससे तेल की मांग कम हो रही है. नतीजतन, अमेरिका अब सऊदी अरब के तेल पर उतना निर्भर नहीं है.

सऊदी अरब की बदलती महत्वाकांक्षाएं: सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से दूर ले जाना चाहता है और उसे अधिक विविध बनाना चाहता है. इसके लिए उसे वैश्विक बाजारों में विभिन्न करेंसीओं के साथ व्यापार करने की आवश्यकता है. साथ ही, सऊदी अरब यह भी चाहता है कि अमेरिका मध्य पूर्व के अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को लेकर अपनाई जाने वाली नीतियों में बदलाव करे. इन सभी कारणों से, पेट्रोडॉलर समझौता अब उतना मजबूत नहीं रहा है, जितना पहले हुआ करता था.

भविष्य का रुख: यह कहना मुश्किल है कि पेट्रोडॉलर प्रणाली पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी या नहीं. हालांकि, यह स्पष्ट है कि भविष्य में इसका स्वरूप बदल सकता है.  कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में एक बहु-करेंसी प्रणाली हो सकती है, जिसमें डॉलर के अलावा अन्य करेंसीज, जैसे युआन, तेल व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

भारत जैसे देशों के लिए इसके मायने: पेट्रोडॉलर प्रणाली में बदलाव से भारत जैसे तेल खरीदारीक देशों के लिए दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.  यदि डॉलर कमजोर होता है, तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत के खरीदारी बिल में वृद्धि हो सकती है.  दूसरी ओर, यदि अन्य करेंसीएं मजबूत होती हैं, तो भारत वैकल्पिक स्रोतों से सस्ता तेल खरीद सकता है.

हाल के समय में क्यों सोना तेजी से खरीद रहे हैं ब्रिक्स देश

ग्लोबल अनसर्टेनिटी: वैश्विक व्यापार युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और महामारी जैसी घटनाओं ने वैश्विक बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है. ऐसे समय में, सोना एक सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में देखा जाता है. सोने की कीमत आमतौर पर आर्थिक मंदी के दौरान स्थिर या बढ़ती रहती है, इसलिए निवेशक इसे अपने पोर्टफोलियो में जोखिम कम करने के लिए शामिल करते हैं.

डॉलर के कमजोर होने की आशंका: अमेरिकी डॉलर दुनिया की आरक्षित करेंसी है, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ विदेशी करेंसीओं के मुकाबले इसका मूल्य कम हुआ है.  ब्रिक्स देशों को लगता है कि डॉलर का कमजोर होना जारी रह सकता है. इसलिए, वे अपने फॉरेन करेंसी भंडार में विविधता लाने के लिए सोना खरीद रहे हैं. सोना एक स्थिर मूल्य वाली वस्तु है, जो महंगाई  के खिलाफ भी सुरक्षा प्रदान करती है.

आर्थिक विकास और बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम: ब्रिक्स देशों में हाल के दशकों में आर्थिक विकास हुआ है, जिससे लोगों की डिस्पोजेबल इनकम में वृद्धि हुई है. बढ़ती इनकम के साथ, लोग सोने जैसे लग्जरियस प्रोडक्ट्स पर खर्च करने में अधिक सहज महसूस करते हैं. सोने को भारत और चीन जैसे ब्रिक्स देशों में सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी प्राप्त है. इन देशों में सोने के आभूषणों को पारंपरिक रूप से धन के संचय और शुभ माना जाता है.

केंद्रीय बैंकों की खरीदारी: ब्रिक्स देशों के कई केंद्रीय बैंक भी अपने विदेशी करेंसी भंडार में विविधता लाने के लिए सोना खरीद रहे हैं. सोना महंगाई और करेंसी के डिवैल्यूएशन के खिलाफ बचाव का एक तरीका है.