नई दिल्ली: अमेरिका में व्यापार नीति को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 प्रतिशत के अस्थायी टैरिफ लागू किए हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोके गए पुराने प्रावधान की जगह लाया गया है. आधी रात से इन टैरिफ की वसूली शुरू भी हो चुकी है.
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये नए शुल्क भी कानूनी चुनौती का सामना करेंगे. अर्थशास्त्रियों और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जिस कानून का सहारा लिया गया है, उसकी बुनियाद ही कमजोर दिख रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ को खारिज कर दिया था. इसके बाद व्हाइट हाउस ने Trade Act 1974 की Section 122 का सहारा लिया. यह प्रावधान राष्ट्रपति को 150 दिनों तक अधिकतम 15 प्रतिशत शुल्क लगाने की अनुमति देता है, यदि देश गंभीर भुगतान संतुलन (BoP) संकट में हो. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते.
ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया कि 1.2 ट्रिलियन डॉलर का वार्षिक वस्तु व्यापार घाटा और प्राथमिक आय अधिशेष का उलट जाना गंभीर समस्या है. हालांकि, पूर्व IMF अधिकारी गीता गोपीनाथ सहित कई अर्थशास्त्रियों ने इस दावे को खारिज किया. उनका कहना है कि अमेरिका न तो मुद्रा संकट से जूझ रहा है, न ब्याज दरों में असामान्य उछाल है और न ही विदेशी पूंजी का प्रवाह रुका है.
विशेषज्ञों ने साफ किया है कि व्यापार घाटा (trade deficit) और भुगतान संतुलन संकट (balance of payments crisis) अलग बातें हैं. अटलांटिक काउंसिल में अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र के अध्यक्ष जोश लिप्स्की के अनुसार, भुगतान संकट तब होता है, जब कोई देश आयात का भुगतान या विदेशी कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाए. फिलहाल, अमेरिका की अर्थव्यवस्था स्थिर है. डॉलर की विनिमय दर तैरती हुई है और 10 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड भी संतुलित बनी हुई है.
दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष न्याय विभाग ने खुद अदालत में कहा था कि Section 122 का उपयोग व्यापार घाटे के मामले में उचित नहीं होगा. उस समय प्रशासन ने स्वीकार किया था कि व्यापार घाटा और भुगतान संतुलन संकट अलग अवधारणाएं हैं. अब वही प्रावधान अपनाया गया है, जिससे कानूनी चुनौती की संभावना और बढ़ गई है. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए नील कत्याल ने भी कहा कि यह फैसला अदालत में आसानी से चुनौती झेल सकता है.
फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि इस बार अदालत में चुनौती कौन देगा. लिबर्टी जस्टिस सेंटर चेयरमैन सारा अलब्रेक्ट ने संकेत दिया है कि वे हालात पर नजर रखे हुए हैं. हालांकि, अदालतें 150 दिनों की समयसीमा में अंतिम फैसला दे पाएंगी या नहीं, यह अनिश्चित है. इस बीच ट्रंप प्रशासन राष्ट्रीय सुरक्षा और अनुचित व्यापार प्रथाओं के आधार पर अन्य कानूनी प्रावधानों, जैसे Sections 232 और 301 के तहत कदम उठाने की तैयारी में है.