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भारत ने भरी ऊंची उड़ान, अब बांस से बनाएगा इथेनॉल, इस राज्य में स्थापित हुआ दुनिया का पहला बैम्बू बेस्ड प्लांट

असम के नुमालीगढ़ में स्थापित दुनिया का पहला बांस आधारित बायो-इथेनॉल संयंत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदल रहा है. 4,930 करोड़ के इस निवेश से 30 हजार किसानों को जोड़कर हरित ऊर्जा की नई क्रांति शुरू की गई है.

ANI
Sagar Bhardwaj

पूर्वोत्तर भारत की खूबसूरत वादियों के बीच असम के गोलाघाट जिले में एक औद्योगिक चमत्कार आकार ले रहा है. नुमालीगढ़ में स्थापित 'असम बायो इथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड' (ABEPL) ने अपनी अभिनव सोच से सबको चौंका दिया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उद्घाटित यह 4,930 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट दुनिया का पहला ऐसा बायो-रिफाइनरी मॉडल है जो गन्ने के बजाय बांस का उपयोग कर रहा है. यह पहल न केवल ईंधन के लिए विदेशों पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि किसानों की जेबें भी भरेगी.

ट्रायल रन में 99.7 प्रतिशत शुद्धता वाला फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल तैयार

यह संयंत्र दुनिया की पहली व्यावसायिक 2G (सेकंड जेनरेशन) की बायो-इथेनॉल फैक्ट्री है जो खाद्य फसलों की जगह बांस को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करती है. इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 49 हजार मीट्रिक टन है. ट्रायल रन के दौरान इस संयंत्र ने 99.7 प्रतिशत शुद्धता वाला फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल तैयार किया है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी अधिक शुद्ध है. यह सफलता दर्शाती है कि भारतीय तकनीक अब वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है.

किसानों की आय में ऐतिहासिक वृद्धि

कंपनी का मुख्य उद्देश्य अगले तीन वर्षों में 30 हजार से अधिक किसानों को इस हरित अभियान का हिस्सा बनाना है. अब तक 4,200 से अधिक किसानों का पंजीकरण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है. पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कंपनी ने बिचौलियों को हटा दिया है और सीधे किसानों के बैंक खातों में 2.4 करोड़ रुपये भेजे हैं. यह मॉडल किसानों को बंजर भूमि का सही उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रहा है जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार निश्चित है.

कार्बन न्यूट्रल और हरित भविष्य का लक्ष्य

एबीईपीएल का लक्ष्य पूरी तरह से 'कार्बन न्यूट्रल' इकाई बनना है. इसके लिए 12,500 हेक्टेयर भूमि पर बांस उगाने की तैयारी चल रही है. अगले तीन वर्षों में 60 लाख नए पौधे रोपे जाएंगे जो पर्यावरण के लिए वरदान साबित होंगे. यह संयंत्र सालाना 25 मेगावाट ग्रीन पावर और लिक्विड कार्बन डाइऑक्साइड का भी उत्पादन करेगा. हरित ऊर्जा की यह दिशा भारत के जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक बेहद शक्तिशाली और प्रभावी हथियार साबित हो सकती है.

क्षेत्रीय विस्तार और चाय बागानों का सहयोग

संयंत्र के 300 किलोमीटर के दायरे में आने वाले असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मेघालय के जिलों को बांस की आपूर्ति के लिए चुना गया है. सरकार द्वारा चाय बागानों की पांच प्रतिशत भूमि को गैर-चाय कार्यों के लिए उपयोग करने की अनुमति मिलने के बाद कई बड़े चाय बागान मालिक भी बांस की खेती के लिए उत्साहित हैं. यह सहयोग पूर्वोत्तर राज्यों के बीच व्यापारिक एकता को बढ़ाएगा और स्थानीय संसाधनों के अधिकतम उपयोग का एक सफल रास्ता दिखाएगा.

जीरो-वेस्ट मॉडल और आर्थिक क्रांति

यह संयंत्र 'जीरो-वेस्ट' सिद्धांत पर आधारित है जहां बांस के हर एक हिस्से का औद्योगिक उपयोग किया जाता है. इथेनॉल के साथ-साथ यहां फरफ्यूरल और एसिटिक एसिड जैसे उत्पादों का निर्माण भी होगा जो औद्योगिक बाजार में काफी मांग में हैं. अनुमान है कि इस मॉडल से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सालाना 200 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष लाभ होगा. यह नवाचार असम को जैव-ईंधन के क्षेत्र में दुनिया के नक्शे पर एक नई पहचान दिलाने वाला है.