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आंध्र प्रदेश और बिहार को क्यों चाहिए विशेष राज्य का दर्जा? आखिर इसी से कैसे होगा लोगों का भला

मोदी सरकार 3.0 के गठन की कवायद शुरू हो चुकी है. इसमें सबसे बड़ा रोल चंद्रबाबू नायडू की TDP और नीतीश कुमार की JDU का है. दोनों ही नेता और राज्य पिछले कई सालों से स्पेशल स्टेटस के दर्जे की मांग कर रहे हैं.

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Andhra Bihar Need Special Status
Courtesy: Social Media

Andhra Bihar Need Special Status: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA में शामिल तेलगू देशम पार्टी (TDP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) पिछले कई सालों से आंध्र प्रदेश और बिहार के लिए स्पेशल स्टेटस की मांग कर रही है. हालांकि, इसके लिए दोनों ही पार्टियों को काफी लंबा इंतजार करना पड़ा है. लेकिन अब शायद इनकी ये मांग पूरी हो जाए. क्योंकि केंद्र में मोदी सरकार 3.0 की कल्पना इन दोनों ही पार्टियों के बिना तो नामुमकिन है. ऐसे में संभावना है कि मोदी सरकार 3.0 को समर्थन के बदले दोनों ही पार्टियां अपने राज्यों के लिए इस बहुप्रतिक्षित मांग को पूरा करा सकती हैं.

अब सवाल आता है कि आखिर स्पेशल स्टेटस का दर्जा वाला मामला क्या है? अगर इसे हासिल कर लिया जाता है, तो इससे किसका भला होगा? इसकी मांग लंबे समय से क्यों की जा रही है? आखिर इस स्पेशल स्टेटस के दर्जे की मांग पर केंद्र सरकार गौर क्यों नहीं कर रही है? आइए, इसे समझते हैं.

आखिर स्पेशल कैटेगरी का दर्जा (SCS) क्या है?

भारत के पांचवें वित्त आयोग ने 1969 में कुछ राज्यों को उनके विकास में सहायता करने के लिए स्पेशल स्टेटस की व्यवस्था शुरू की थी. इसमें कहा गया कि अगर कोई राज्य ऐतिहासिक आर्थिक या भौगोलिक नुकसान का सामना कर रहा है, तो ऐसे में उस राज्य के विकास की गति धीमी हो जाएगी. ऐसे में इस तरह के राज्य में विकास को धार देने के लिए भी स्पेशल स्टेटस का दर्जा दिया जाना चाहिए.

अब सवाल आया कि क्या विकास की रफ्तार को ही ध्यान में रखकर स्पेशल स्टेटस का दर्जा मिलना चाहिए? बाद में 5वें वित्त आयोग की ओर से बताया गया कि स्पेशल स्टेटस का दर्जा देने के लिए आमतौर पर कठिन और पहाड़ी इलाके, कम जनसंख्या घनत्व या बड़ी जनजातीय आबादी, सीमाओं के साथ रणनीतिक स्थान आदि कारकों पर विचार किया जाना चाहिए और पहले होता भी ऐसा ही था. लेकिन एक वक्त ऐसा आया कि इस प्रणाली को खत्म कर दिया गया. ऐसा 14वें वित्त आयोग की सिफारिश पर किया गया, जिसमें सुझाव दिया गया था कि इस तरह की परेशानियों से जूझ रहे राज्यों को स्पेशल स्टेटस का दर्ज न देकर संसाधन अंतर को मौजूदा 32% से बढ़ाकर 42% कर देना चाहिए.

रिपोर्ट्स के मुताबकि, पहली बार 1969 में जम्मू कश्मीर, असम और नगालैंड को स्पेशल स्टेटस का दर्जा दिया गया. इसके बाद इस लिस्ट में बाद में हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, उत्तराखंड, तेलंगाना को शामिल किया. स्पेशल स्टेटस का दर्जा पाने वाला तेलंगाना सबसे नया राज्य है.

अनुच्छेद 370 के रद्द होने से पहले जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस का दर्जा प्राप्त था, लेकिन बाद में इसके केंद्र शासित प्रदेश बन जाने के बाद स्पेशल स्टेटस का दर्जा हटा लिया गया. यानी देश में फिलहाल 11 ऐसे राज्य हैं, जिन्हें स्पेशल स्टेटस का दर्जा प्राप्त है.

आखिर बिहार क्यों चाहता है स्पेशल स्टेटस का दर्जा?

आर्थिक असमानता, प्राकृतिक आपदा, बुनियादी ढांचों की कमी, गरीबी और सामाजिक विकास, विकास के लिए अनुदान की मांग को लेकर बिहार की ओर से स्पेशल स्टेटस की मांग की जाती रही है. बिहार सरकार की ओर से कहा जाता रहा है कि राज्य को औद्योगिक विकास की कमी और सीमित निवेश अवसरों समेत गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. जब बिहार से झारखंड को अलग किया गया तो राज्य में रोजगार और आर्थिक विकास का संकट भी पैदा हो गया.

इसके अलावा कहा जाता रहा है कि राज्य के उत्तरी क्षेत्र में बाढ़ और दक्षिणी भाग में गंभीर सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा आती रहती है. इससे किसानी प्रभावित होती है और लोगों की आजीविका के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता पर प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा, ये भी दावा किया गया है कि बिहार में गरीबी दर अधिक है. राज्य में करीब 94 लाख परिवार गरीब हैं. 

अब सवाल ये कि क्या वाकई बिहार को स्पेशल स्टेटस के दर्ज की जरूरत है?

कई मायनों में तो बिहार स्पेशल स्टेटस के लिए डिजर्व करता है, लेकिन ये राज्य पहाड़ी इलाकों और भौगोलिक रूप से विषम परिस्थितयों को पूरा नहीं करता है. साल 2013 में तत्कालीन मनमोहन सरकार की ओर से बनाई गई रघुराम राजन कमिटी ने राज्य को अल्प विकसित श्रेणी में रखा था. स्पेशल स्टेटस के बजाए बहु-आयामी सूचकांक (Multidimensional index) पर आधारित एक नई पद्धति का भी कमिटी की ओर से सुझाव दिया गया, जिससे राज्‍य के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिये फिर से विचार किया जा सकता है.

आंध्र प्रदेश स्पेशल स्टेटस का दर्जा क्यों चाहता है?

2014 में जब आंध्र प्रदेश को दो हिस्सों में बांटकर अलग तेलंगाना राज्य बनाया गया, तब यूपीए सरकार ने इसकी भरपाई के लिए आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का वादा किया था. कुछ दिनों बाद ही केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आ गई. तब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ही थे. पांच साल बाद यानी 2019 में आंध्र में सरकार बदली और सत्ता जगनमोहन रेड्डी के पास चली गई. दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार से बार-बार स्पेशल स्टेटस की मांग की गई, ताकि राज्य में मौजूद वित्तीय संकट को केंद्र सरकार की मदद से दूर किया जा सके. लेकिन दोनों ही मुख्यमंत्रियों की मांग को टाल दिया गया.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना राज्य बना, तब आंध्र प्रदेश पर 97,000 करोड़ रुपये का कर्ज था. 2018-19 तक ये कर्ज बढ़कर 2,58,928 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और अब 3.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है. आंध्र प्रदेश का तर्क है कि राज्य को अन्यायपूर्ण और असमान तरीके से विभाजित किया गया था. आंध्र प्रदेश को मूल राज्य की लगभग 59% आबादी, ऋण और देनदारियां विरासत में मिलीं हैं. आज का आंध्र प्रदेश कृषि प्रधान राज्य है, जिसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, जिसके कारण रेवेन्यू में कमी आई है. 

स्पेशल स्टेटस के दर्ज से आंध्र प्रदेश में क्या बदल जाएगा?

स्पेशल स्टेटस का दर्जा अगर आंध्र प्रदेश को मिलता है, तो केंद्र सरकार की ओर से राज्य सरकार को मिलने वाली अनुदान राशि में बढ़ोतरी होगी. स्पेशल स्टेटस कैटेगरी वाले राज्यों को मिलने वाली छूट का भी लाभ मिलेगा. जिन राज्यों को ये स्टेटस मिलता है, उन्हें आयकर छूट, सीमा शुल्क माफी, कम उत्पाद शुल्क, एक निश्चित अवधि के लिए कॉर्पोरेट कर छूट, जीएसटी से संबंधित रियायतें और छूट तथा कम राज्य और केंद्रीय टैक्स का लाभ मिलता है. इस कैटेगरी में आने वाले राज्यों को केंद्र सरकार, केंद्रीय योजनाओं के लिए 90 फीसदी तक फंड मुहैया कराती है, जबकि जिन राज्यों को ये स्टेटस नहीं मिला है, उन राज्यों को केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय योजनाओं के लिए 70 फीसदी तक ही फंड मिलता है.