menu-icon
India Daily

जब प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर दिखने लगा था एक 'बाहरी' नेता! सत्ता के पीछे चल रही थी समानांतर राजनीति

2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का राजनीतिक प्रभाव बेहद मजबूत था. प्रधानमंत्री पद से दूर रहते हुए भी उन्होंने गठबंधन, पार्टी और नीतिगत फैसलों पर महत्वपूर्ण असर डाला.

KanhaiyaaZee
जब प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर दिखने लगा था एक 'बाहरी' नेता! सत्ता के पीछे चल रही थी समानांतर राजनीति
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली: भारत की राजनीति में सत्ता का सबसे दिलचस्प चेहरा हमेशा वह नहीं होता, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा हो. कई बार असली राजनीतिक प्रभाव उस व्यक्ति के पास दिखाई देता है, जिसके पास संवैधानिक रूप से सरकार चलाने की कोई जिम्मेदारी नहीं होती. 2004 से 2014 के बीच का दौर इस सवाल को समझने के लिए सबसे दिलचस्प उदाहरणों में से एक है.

उस समय देश के प्रधानमंत्री थे डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष थीं सोनिया गांधी. मनमोहन सिंह सरकार के मुखिया थे, जबकि सोनिया गांधी न तो प्रधानमंत्री थीं और न ही केंद्र सरकार में मंत्री. इसके बावजूद लंबे समय तक दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चलती रही कि सत्ता के दो केंद्र बन गए हैं और इनमें से एक केंद्र प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर है.

इसी वजह से सोनिया गांधी को कभी "पावर बिहाइंड द थ्रोन", कभी "सुपर पीएम" और कभी "रिमोट कंट्रोल" जैसे राजनीतिक विशेषण दिए गए. लेकिन क्या वास्तव में प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकत उनके पास थी? या फिर यह उस दौर की गठबंधन राजनीति की एक अलग व्यवस्था थी? इस कहानी का जवाब आरोपों से ज्यादा घटनाओं और दस्तावेजों में छिपा है.

क्या था वो फैसला जिसने सबको चौंका दिया?

2004 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए बड़ा मोड़ था. अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार सत्ता से बाहर हो गई और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सत्ता में आया.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उस समय प्रधानमंत्री पद की सबसे स्वाभाविक दावेदार थीं. कांग्रेस संसदीय दल ने उन्हें नेता चुना था और सहयोगी दल भी उनके साथ थे. 15 मई 2004 को कांग्रेस संसदीय दल ने उन्हें प्रधानमंत्री के लिए चुना भी था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद राजनीतिक घटनाक्रम अचानक बदल गया.

18 मई 2004 को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का पद उनका लक्ष्य नहीं था और उन्होंने अपनी "अंतरात्मा" की आवाज के आधार पर पद ठुकराने की बात कही. इसके बाद सवाल था कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा.

नाम सामने आए कांग्रेस के दो बड़े नेताओं के, प्रणब मुखर्जी और डॉ. मनमोहन सिंह. आखिरकार सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह के नाम पर सहमति दी और 22 मई 2004 को मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.

यह फैसला सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि देश को एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मिला. असली दिलचस्पी इस बात में थी कि सरकार का राजनीतिक नेतृत्व और कांग्रेस संगठन का नेतृत्व अलग-अलग हाथों में चला गया.

मनमोहन सिंह के पास प्रधानमंत्री की संवैधानिक ताकत थी, जबकि सोनिया गांधी के पास कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पार्टी की ताकत और यूपीए अध्यक्ष के रूप में गठबंधन की राजनीतिक कमान थी. यहीं से उस दो सत्ता केंद्र वाली राजनीति की शुरुआत हुई, जिसकी चर्चा अगले दस साल तक होती रही.

सोनिया गांधी के पास कौन-सी ताकत थी?

यह समझना जरूरी है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं थीं. संविधान के तहत सरकार चलाने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की थी. लेकिन राजनीति केवल संवैधानिक पदों से नहीं चलती. किसी गठबंधन सरकार में पार्टी अध्यक्ष, गठबंधन प्रमुख और सहयोगी दलों के बीच तालमेल रखने वाले नेता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है.

2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद सोनिया गांधी यूपीए की अध्यक्ष बनी रहीं. साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वह पार्टी के संगठन और राजनीतिक रणनीति का प्रमुख चेहरा थीं.

प्रधानमंत्री कार्यालय के उस समय के दस्तावेज भी बताते हैं कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच राजनीतिक संबंध औपचारिकता से कहीं आगे थे. अगस्त 2004 में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी के नेतृत्व और चुनावी भूमिका की खुलकर प्रशंसा की तथा कहा कि जनता का जनादेश मूल रूप से उन्हें सरकार का नेतृत्व करने के पक्ष में था.

यानी शुरुआत से ही यह व्यवस्था ऐसी थी जिसमें प्रधानमंत्री सरकार चला रहे थे, लेकिन सरकार को सत्ता तक पहुंचाने वाली राजनीतिक मशीनरी का केंद्र सोनिया गांधी थीं.

नेशनल एडवाइजरी काउंसिल कैसे बदली सत्ता की तस्वीर?

इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय था- नेशनल एडवाइजरी काउंसिल यानी NAC. जून 2004 में केंद्र सरकार ने NAC का गठन किया. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम को लागू करने और उसकी प्रगति पर नजर रखने के साथ-साथ सरकार को विभिन्न सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर सुझाव देना था. इसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं. प्रधानमंत्री कार्यालय के दस्तावेज बताते हैं कि परिषद के सदस्यों का चयन प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी से परामर्श के बाद किया था.

कागज पर NAC एक सलाहकार संस्था थी, लेकिन राजनीति में उसका प्रभाव कागज से कहीं बड़ा दिखाई देने लगा. सूचना का अधिकार, ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसे कई महत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों के पीछे NAC की चर्चाओं और सिफारिशों की भूमिका रही. कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट भी NAC की सिफारिशों को मनरेगा, RTI, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और मिड-डे मील जैसी पहलों से जोड़ती है.

यही वह बिंदु था जहां आलोचकों ने सवाल उठाना शुरू किया कि अगर किसी संस्था के पास कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति नहीं है, लेकिन उसके सुझाव सरकार की नीतियों को प्रभावित कर रहे हैं, तो उसके वास्तविक राजनीतिक प्रभाव को कैसे देखा जाए? विपक्ष ने NAC को कई बार सुपर कैबिनेट जैसा बताया.

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2010 में स्पष्ट कहा था कि NAC कोई "सुपर कैबिनेट" नहीं बल्कि एक सलाहकार संस्था है. उन्होंने यह भी कहा था कि परिषद ने सामाजिक विकास के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि NAC ने संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री की जगह ले ली थी, लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि उसका राजनीतिक प्रभाव मामूली था.

2006 में एक इस्तीफे ने पूरी बहस को और तेज कर दिया

मार्च 2006 में सोनिया गांधी ने लोकसभा की सदस्यता और NAC के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. वजह थी "ऑफिस ऑफ प्रॉफिट" को लेकर उठे सवाल.
विपक्ष का आरोप था कि सांसद रहते हुए NAC का पद संभालना हितों के टकराव और अयोग्यता से जुड़ा सवाल पैदा करता है. सोनिया गांधी ने इस्तीफा देकर राजनीतिक विवाद को शांत करने की कोशिश की.

यह घटना महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे पहली बार यह साफ दिखाई दिया कि NAC सिर्फ कोई सामान्य सरकारी सलाहकार समिति नहीं थी. उसके अध्यक्ष का राजनीतिक महत्व इतना अधिक था कि उनके हटते ही संस्था की भूमिका और भविष्य पर चर्चा शुरू हो गई.

कुछ समय तक NAC का नेतृत्व खाली रहा. बाद में 2010 में इसे फिर से गठित किया गया और सोनिया गांधी को दोबारा इसका अध्यक्ष बनाया गया. इस बार सरकार के आधिकारिक आदेश में उन्हें केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के बराबर दर्जा और सुविधाएं देने की बात कही गई थी. यहीं से "दो सत्ता केंद्र" की बहस अपने दूसरे और ज्यादा विवादित चरण में पहुंची.

2010 के बाद सवाल और बड़ा हो गया

UPA-II के दौर में सोनिया गांधी एक साथ कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए की चेयरपर्सन थीं. साथ ही वह NAC की अध्यक्ष भी थीं. दूसरी तरफ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. इस व्यवस्था को कुछ लोगों ने सत्ता के दोहरे केंद्र के रूप में देखा. 2012 में Economic Times के एक संपादकीय में भी यूपीए के भीतर "dual power structure" की चर्चा की गई थी. लेकिन यह सिर्फ विपक्ष की बात नहीं थी. मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू ने 2014 में अपनी किताब The Accidental Prime Minister में दावा किया कि प्रधानमंत्री की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत को सोनिया गांधी के प्रभाव ने कमजोर किया था.

बारू का दावा था कि कांग्रेस अध्यक्ष सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों और नियुक्तियों पर प्रभाव रखती थीं और इससे प्रधानमंत्री की भूमिका सीमित होती गई. उनकी किताब ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया.

क्या मनमोहन सिंह सिर्फ नाम के प्रधानमंत्री थे?

यह निष्कर्ष भी पूरी तरह सही नहीं होगा. मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण फैसले उनके नेतृत्व में हुए. 2008 का भारत-अमेरिका परमाणु समझौता हो, आर्थिक नीति से जुड़े फैसले हों या वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान भारत की प्रतिक्रिया—प्रधानमंत्री की भूमिका वास्तविक और महत्वपूर्ण थी.

खुद प्रणब मुखर्जी ने बाद में अपने संस्मरण में लिखा कि सोनिया गांधी ने 2004 में मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना था. उन्होंने यह भी माना कि मनमोहन सिंह उस समय देश का नेतृत्व करने के लिए सही व्यक्ति थे.

मनमोहन सिंह ने भी अपने सार्वजनिक बयानों में सोनिया गांधी को अपना "राजनीतिक बॉस" बताकर सरकार की संवैधानिक व्यवस्था को खारिज नहीं किया था. इसके उलट वह कई मौकों पर सरकार और पार्टी के बीच तालमेल की जरूरत पर जोर देते रहे.

यानी तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल थी. यह "प्रधानमंत्री बनाम सोनिया गांधी" की सीधी लड़ाई नहीं थी. यह एक ऐसी गठबंधन व्यवस्था थी जिसमें सरकार का संवैधानिक नेतृत्व और पार्टी-गठबंधन का राजनीतिक नेतृत्व अलग-अलग व्यक्तियों के हाथ में था.

फिर 'बाहरी' नेता कौन थे?

सोनिया गांधी को "बाहरी" कहना भी अपने आप में एक राजनीतिक बहस है. उनका जन्म इटली में हुआ था और इसी वजह से 2004 में उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर विपक्ष के एक हिस्से ने जोरदार राजनीतिक अभियान चलाया. लेकिन वह भारतीय नागरिक थीं. उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल की थी.

इसलिए संवैधानिक और कानूनी अर्थ में उन्हें "विदेशी" कहना सही नहीं होगा. "बाहरी" शब्द उस समय की राजनीतिक भाषा का हिस्सा था—खासकर उन लोगों के लिए जो उनके विदेशी जन्म को राजनीतिक मुद्दा बनाते थे. दिलचस्प बात यह है कि इसी विरोध ने शायद 2004 की पूरी सत्ता संरचना को जन्म देने में भूमिका निभाई.

अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनतीं, तो विदेशी जन्म का मुद्दा सरकार के सामने लगातार राजनीतिक संकट पैदा कर सकता था. उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इनकार किया, लेकिन राजनीति से दूरी नहीं बनाई. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला, यूपीए का नेतृत्व किया और बाद में NAC के जरिए सामाजिक नीति के क्षेत्र में प्रभावशाली भूमिका निभाई. यानी उन्होंने सत्ता की कुर्सी छोड़ी, लेकिन सत्ता के राजनीतिक केंद्र से बाहर नहीं गईं.

क्या यह व्यवस्था लोकतांत्रिक रूप से असामान्य थी?

यही सबसे बड़ा सवाल है. एक तरफ प्रधानमंत्री संवैधानिक रूप से सरकार के मुखिया थे. मंत्रिमंडल उनके नेतृत्व में काम करता था. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर काम करते थे और संसद के प्रति सरकार जवाबदेह थी.

दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष सरकार के सबसे बड़े दल की प्रमुख थीं और यूपीए गठबंधन की चेयरपर्सन भी. इसका मतलब था कि प्रधानमंत्री को सरकार चलाने के लिए पार्टी नेतृत्व और सहयोगी दलों के राजनीतिक समीकरणों का ध्यान रखना पड़ता था. गठबंधन राजनीति में यह असामान्य नहीं है.

लेकिन UPA-I और UPA-II की खासियत यह थी कि दोनों भूमिकाएं बेहद शक्तिशाली व्यक्तियों के पास थीं. इससे दो अलग-अलग प्रकार की सत्ता दिखाई देती थी—एक संवैधानिक और दूसरी राजनीतिक. यही वजह थी कि "दो सत्ता केंद्र" की बहस बार-बार सामने आती रही.

सोनिया गांधी की ताकत सिर्फ NAC से नहीं आती थी यह समझना भी जरूरी है कि सोनिया गांधी का प्रभाव केवल NAC के कारण नहीं था. वह कांग्रेस अध्यक्ष थीं. 2004 और 2009 के चुनावों में कांग्रेस की केंद्रीय राजनीतिक रणनीति में उनकी भूमिका थी. 2009 में कांग्रेस ने 206 लोकसभा सीटें जीतीं, जो 1991 के बाद पार्टी का सबसे बड़ा प्रदर्शन था.

UPA सरकार में कई महत्वपूर्ण फैसले सहयोगी दलों के समर्थन और कांग्रेस संगठन के राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर थे. ऐसे में सोनिया गांधी की वास्तविक ताकत तीन जगहों से बनती थी—

  • पहली, कांग्रेस संगठन.
  • दूसरी, यूपीए गठबंधन का नेतृत्व.
  • तीसरी, NAC जैसे मंच के जरिए सामाजिक नीति पर प्रभाव.

इन तीनों को जोड़ दें तो यह समझना आसान हो जाता है कि बिना प्रधानमंत्री बने भी कोई नेता सरकार के फैसलों पर बड़ा राजनीतिक असर कैसे डाल सकता है.

लेकिन एक दूसरी तस्वीर भी थी, सोनिया गांधी के प्रभाव को सिर्फ सत्ता हथियाने की कोशिश के रूप में देखना भी अधूरा होगा. NAC ने जिन मुद्दों को आगे बढ़ाया, उनमें RTI और ग्रामीण रोजगार जैसे अधिकार आधारित कार्यक्रम शामिल थे. कई सामाजिक कार्यकर्ता, अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ इसके सदस्य थे. सरकार के आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि NAC में अरुणा रॉय, ज्यां द्रेज, एनसी सक्सेना, सैम पित्रोदा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को शामिल किया गया था.

इसलिए NAC को केवल "सोनिया गांधी का निजी सत्ता केंद्र" कहना भी तथ्यात्मक रूप से बहुत सरल निष्कर्ष होगा. वह एक राजनीतिक-सामाजिक सलाहकार मंच भी था, जिसने UPA की नीतियों पर वास्तविक असर डाला. समस्या वहां पैदा हुई जहां सलाह और राजनीतिक निर्णय के बीच की रेखा धुंधली दिखाई देने लगी.

2014 ने इस प्रयोग का अंत कर दिया

2014 के लोकसभा चुनाव ने यूपीए की पूरी राजनीतिक संरचना बदल दी. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. इसके साथ मनमोहन सिंह का दस साल लंबा प्रधानमंत्री कार्यकाल समाप्त हुआ और UPA सरकार का वह मॉडल भी खत्म हो गया जिसमें प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष अलग-अलग सत्ता केंद्रों के रूप में काम करते थे.

NAC भी मई 2014 में समाप्त हो गया. इसके साथ भारत की राजनीति में वह अध्याय भी बंद हो गया जिसमें एक नेता सरकार के भीतर प्रधानमंत्री की भूमिका निभा रहा था और दूसरा नेता सरकार के बाहर रहते हुए राजनीतिक दिशा पर असाधारण प्रभाव रखता था.