नई दिल्ली: भारत में आज जी-20 शिखर सम्मेलन का आखिरी दिन है. 27 देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए दिल्ली आए.
लगभग 4,200 करोड़ रुपए खर्च कर भारत इस समिट का आयोजन कर रहा है. इतनी मोटी रकम खर्च करने के बाद ये सवाल उठ रहे हैं कि आखिर भारत को इस समिट से क्या हासिल होगा?
तो आइए इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं...
दरअसल, भारत ने जी-20 के लिए सतत विकास के लक्ष्य के मुद्दे को आगे बढ़ाया है. जी-20 अध्यक्ष के रूप में भारत खाद्द, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, समावेशी विकास, डिजिटलाइजेशन, जलवायु परिवर्तन और समान स्वास्थ्य पहुंच जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है.
अगर इनमें से किसी भी मुद्दे पर एकसमान राय बनती है तो इसका सीधा श्रेय भारत को मिलेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास वैश्विक मुद्दों पर अपनी सोच को आगे बढ़ाने का मौका है.
इन मुद्दों पर बनी सहमति
जी-20 समिट से इतर पीएम मोदी ने कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ द्विपक्षीट बैठकें भी कीं. अमेरिका से छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर और जेट इंजन बनाने की तकनीक की डील भी आगे बढ़ी.
यूएई, अमेरिका, भारत, सऊदी अरब और यूरोपीय देशों के बीच एक संयुक्त रेल और पोर्ट्स नेटवर्क योजना को लेकर भी सहमति बनी है. इससे भारत सीधे यूरोप से जुड़ जाएगा.
इस परियोजना को चीन के वन बेल्ट, वन रोड के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है.
अफ्रीकी यूनियन को शामिल किया जाना भारत की बड़ी जीत
भारत की अध्यक्षा में अफ्रीकी यूनियन को भी जी-20 में शामिल किया गया है. इसे भी भारत के लिए एक बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है. अफ्रीकी यूनियन को जी-20 में शामिल करने को भी ग्लोबल साउथ में चीन की बढ़ती पैठ को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
जी-20 के समापन अवसर पर एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया जाता है. भारत की अध्यक्षता में पहले इस पर सहमति नहीं बन रही थी. रूस-यूक्रेन युद्ध इसमें मुख्य अड़चन बन रहा था. इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों और रूस और चीन में सहमति नहीं बन रही थी. हालांकि अंत में भारत सभी देशों को एक साथ लाने में कामयाबर रहा, नजीतजन समिट के पहले ही दिन यूक्रेन युद्ध समेत अन्य मुद्दों पर एक संयुक्त बयान 'दिल्ली घोषणा' के रूप में जारी किया गया.
भारत के लिए क्या है मुख्य चुनौती?
जी-20 देशों के बीच जलवायु परिवर्तन, रूस यूक्रेन युद्ध, कोरोना महामारी जैसे मुद्दों पर विरोधाभास रहा है. यूक्रेन युद्ध पर चीन और रूस का विपरीत रुख रहा है. जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी सभी देशों की राय एक नहीं हैं. विकासशील देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के नियमों का पालन नहीं करना चाहते और वे विकसित या औद्योगिक देशों को इसका दोषी ठहराते हैं. ऐसे में इस सम्मेलन से कुठ ठोस नतीजे नहीं निकलने का डर है.