पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद मुश्किलों का सामना कर रही तृणमूल कांग्रेस को बार काउंसिल चुनाव में बड़ी राहत मिली है. पार्टी ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल की 23 निर्वाचित सीटों में से 15 पर जीत दर्ज की. नतीजों को पार्टी के कानूनी क्षेत्र में बने प्रभाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने वाली BJP बार काउंसिल चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. पार्टी को केवल तीन सीटें मिलीं. वहीं लेफ्ट फ्रंट ने भी तीन सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के खाते में दो सीटें आईं. पांच सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं, जिनमें TMC ने चार और कांग्रेस ने एक सीट जीती.
इस चुनाव में कुल 75 उम्मीदवार मैदान में थे. TMC ने सभी 23 निर्वाचित सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जबकि BJP ने 22 प्रत्याशियों को मैदान में भेजा. लेफ्ट फ्रंट के 12 और 18 निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चुनाव लड़ा. TMC की ओर से जीतने वाले प्रत्याशियों को कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व की सिफारिश के आधार पर मैदान में उतारा गया था.
TMC sweeps the West Bengal Bar Association elections! BJP wiped out!
— AITC WB Information Technology & Social Media Wing (@AITCITwing) August 18, 2026
You can seize power through a stolen Assembly election, but you can never win the hearts of the people.
Jai Bangla 💚
Trinamool Congress Jindabad 💚 pic.twitter.com/PXfhqgjAZ8
बार काउंसिल में महिलाओं के लिए आरक्षित पांच सीटों में से चार पर TMC उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया महिला उम्मीदवारों में से दो अतिरिक्त महिला सदस्यों को नामित करेगा. इसके बाद पश्चिम बंगाल बार काउंसिल की कुल सदस्य संख्या 25 हो जाएगी.
इस चुनाव में BJP ने अपनी पिछली तीन सीटों की संख्या बरकरार रखी. कांग्रेस ने भी दो सीटों पर अपना पिछला प्रदर्शन कायम रखा. दूसरी ओर, लेफ्ट फ्रंट को नुकसान हुआ और उसकी सीटें चार से घटकर तीन रह गईं. TMC खेमे में नतीजों के बाद उत्साह देखा गया. पार्टी की ओर से सुबाशीष चक्रवर्ती ने सबसे बड़े अंतर से जीत दर्ज की.
TMC के वकील प्रकोष्ठ से जुड़े संजय बर्धन के मुताबिक, चुनाव में विभिन्न जिलों की अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों ने मतदान किया. मतदान प्रक्रिया 9 मार्च से शुरू हुई थी. TMC इस नतीजे को विधानसभा चुनाव में झटके के बावजूद कानूनी समुदाय के एक हिस्से में अपनी संगठनात्मक पकड़ कायम रहने के संकेत के रूप में देख रही है.