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क्यों 'जातिगत भेदभाव नियम' लाने को मजबूर हुआ UGC? रोहित वेमुला केस और SC के निर्देश बने वजह

यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नए नियम लागू किए हैं. ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बने हैं और छात्र आत्महत्याओं से जुड़े मामलों की पृष्ठभूमि में अहम माने जा रहे हैं.

Kanhaiya Kumar Jha
क्यों 'जातिगत भेदभाव नियम' लाने को मजबूर हुआ UGC? रोहित वेमुला केस और SC के निर्देश बने वजह
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली: कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने नए नियम लागू किए हैं. ये नियम सुप्रीम कोर्ट की कड़ी निगरानी और लंबे कानूनी हस्तक्षेप के बाद सामने आए हैं. अदालत ने बार-बार कहा था कि कमजोर पृष्ठभूमि के छात्रों को संस्थागत संरक्षण नहीं मिल रहा. रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों ने व्यवस्था की खामियों को उजागर किया, जिसके बाद ठोस और लागू होने योग्य नियमों की जरूरत महसूस की गई.

यह मामला पहली बार 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जब रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने जनहित याचिका दायर की. दोनों छात्रों की मौत कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद हुई थी. याचिका में कहा गया कि 2012 में बने भेदभाव विरोधी नियम केवल कागजों तक सीमित हैं. अदालत ने इस पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि संस्थान कमजोर छात्रों को सुरक्षा देने में नाकाम रहे हैं.

कागजों तक सीमित पुराने नियम

सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि अधिकतर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने 2012 के नियमों को लागू ही नहीं किया. कई संस्थानों में न तो शिकायत निवारण प्रकोष्ठ थे और न ही समान अवसर समितियां. इसका नतीजा यह हुआ कि भेदभाव झेल रहे छात्रों के पास शिकायत दर्ज कराने या मदद पाने का कोई प्रभावी मंच नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे संस्थागत विफलता माना.

यूजीसी को मिले स्पष्ट निर्देश

जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को सभी केंद्रीय, राज्य, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों से जानकारी जुटाने का आदेश दिया. अदालत ने पूछा कि कितने संस्थानों में Equal Opportunity Cells बने हैं. साथ ही 2012 के नियमों के तहत मिली शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट मांगी गई. एक विशेषज्ञ समिति ने भी माना कि छात्रों के लिए मजबूत संरक्षण तंत्र की जरूरत है.

आईआईटी छात्र आत्महत्याओं से जुड़ा मुद्दा

मामला फिर चर्चा में आया जब आईआईटी दिल्ली के छात्र अमित कुमार और आयुष अशना की आत्महत्याएं हुईं. मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स बनाने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि उत्पीड़न, अकादमिक दबाव और भेदभाव से होने वाली आत्महत्याओं को रोकने के लिए संस्थागत व्यवस्था जरूरी है.

नियम लागू, निगरानी जरूरी

15 जनवरी 2026 को अदालत को बताया गया कि यूजीसी Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026 को अधिसूचित कर दिया गया है. वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने इसके क्रियान्वयन पर चिंता जताई. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नियमों की सख्त निगरानी जरूरी होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि असली परीक्षा अब नियमों के ईमानदार पालन में है.