नई दिल्ली: मुंबई में आयोजित 'संघ की 100 साल की यात्रा: नए क्षितिज' कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने राष्ट्र निर्माण और हिंदू पहचान पर अपने विचार साझा किए. उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस को केवल धारणाओं या दुष्प्रचार के माध्यम से नहीं, बल्कि सक्रिय संवाद के जरिए ही समझा जा सकता है. भागवत ने विभाजन की ऐतिहासिक त्रासदी का जिक्र करते हुए इसे धर्म आधारित बताया और वर्तमान पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का आह्वान किया.
मोहन भागवत ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण संबोधन में कहा कि भारत का विभाजन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह तब हुआ जब हम अपने मूल 'हिंदू भाव' को भूल गए थे. उन्होंने तर्क दिया कि धर्म के आधार पर हुआ यह बंटवारा उस समय की कड़वी सच्चाई थी. हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत में विविध धर्मों के बावजूद एकता बनी हुई है क्योंकि हिंदू संस्कृति स्वाभाविक रूप से सभी मतों का सम्मान करना सिखाती है.
संघ प्रमुख ने हिंदुत्व की व्याख्या करते हुए इसे सुरक्षा की गारंटी बताया. उनके अनुसार, हिंदुत्व को अपनाने का अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति को अपनी भाषा या धार्मिक प्रथाओं का त्याग करना पड़े. उन्होंने जोर देकर कहा कि अलग-अलग खान-पान और भाषा के बावजूद हम समाज और राष्ट्र के रूप में एक हैं. भागवत ने 'हिंदू-मुस्लिम एकता' शब्द को भ्रामक बताते हुए कहा कि जो पहले से ही एक हैं, उन्हें एकजुट करने की बात करना तकनीकी रूप से गलत है.
स्वदेशी की आवश्यकता पर बल देते हुए भागवत ने एक संतुलित वैश्विक नजरिया पेश किया. उन्होंने कहा कि आज के दौर में स्वदेशी जरूरी है, लेकिन हमें वैश्विक निर्भरता से भी इनकार नहीं करना चाहिए. उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि देशों के बीच यह आर्थिक निर्भरता टैरिफ या दंड जैसे प्रतिबंधों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए. यह दृष्टिकोण भारत की बढ़ती आर्थिक कूटनीति और वैश्विक व्यापारिक भागीदारी की दिशा में एक स्पष्ट संकेत माना जा रहा है.
आरएसएस की प्रकृति और उसके कामकाज के बारे में बात करते हुए सरसंघचालक ने संवाद को अनिवार्य बताया. उन्होंने कहा कि संघ के विरुद्ध यदि किसी के पास तथ्यात्मक आपत्तियां हैं, तो संगठन सुधार के लिए हमेशा तैयार है. हालांकि, इसके लिए लोगों को संघ के करीब आकर उसे करीब से देखना होगा. धारणाओं और दुष्प्रचार के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना न्यायपूर्ण नहीं है. उन्होंने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए एक-दूसरे का पूरक बनने की अपील की.
सामाजिक सुधार की दिशा में भागवत ने परिवारों के भीतर बातचीत के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में युवाओं को नशे की लत और आत्महत्या जैसे आत्मघाती विचारों से बचाने के लिए घर में संवाद की संस्कृति विकसित करना आवश्यक है. उनके अनुसार, जब युवाओं में 'स्व का बोध' और 'स्व का गौरव' जागृत होगा, तभी वे सुरक्षित और जिम्मेदार नागरिक बन पाएंगे. परिवारों में यह जुड़ाव राष्ट्र की नींव को और अधिक मजबूत करेगा.