नई दिल्ली: मुंबई में आयोजित 'संघ की 100 वर्ष की यात्रा - नए आयाम' कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर के योगदान को रेखांकित किया. भागवत ने सावरकर को भारत रत्न देने में हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे पहले से ही करोड़ों भारतीयों के दिलों में बसते हैं. इस दौरान उन्होंने आरएसएस की कार्यशैली, प्रचार के सिद्धांतों और संवाद की भाषा के महत्व को भी विस्तार से समझाया. यह संबोधन संघ के भविष्य के विजन को स्पष्ट करता है.
मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा कि सावरकर को भारत रत्न देना खुद उस सम्मान के लिए गौरवपूर्ण क्षण होगा. उन्होंने उल्लेख किया कि सावरकर को किसी आधिकारिक पुरस्कार की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जनता ने उन्हें पहले ही सर्वोच्च सम्मान दे दिया है. भागवत ने सावरकर को लेकर जारी राजनीतिक विवाद पर चिंता व्यक्त की और कहा कि वे संबंधित समिति से इस देरी का कारण पूछेंगे. उनके अनुसार, सावरकर का व्यक्तित्व और कृतित्व पुरस्कारों की सीमाओं से कहीं अधिक विशाल है.
सावरकर का नाम अक्सर राजनीतिक खींचतान का केंद्र रहता है. जहां बीजेपी और शिवसेना उन्हें एक महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक के रूप में देखती हैं, वहीं कांग्रेस उनके द्वारा दायर दया याचिकाओं के आधार पर उनका विरोध करती है. भागवत ने इन मतभेदों के बीच सावरकर की देशभक्ति पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि सावरकर जैसे व्यक्तित्वों का सम्मान देश की ऐतिहासिक समझ को मजबूत करने के लिए आवश्यक है. संघ इस मुद्दे पर हमेशा से स्पष्ट और दृढ़ रुख रखता आया है.
आरएसएस की 100 साल की यात्रा पर चर्चा करते हुए भागवत ने संगठन की कार्यशैली पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि संघ का मुख्य लक्ष्य मूल्यों की स्थापना करना है, न कि भारी प्रचार करना. भागवत ने प्रचार की तुलना 'बारिश' से करते हुए कहा कि इसे केवल जरूरत के मुताबिक और सही समय पर होना चाहिए. उनके अनुसार, अत्यधिक प्रचार व्यक्ति में अहंकार पैदा कर सकता है, जिससे संगठन के मूल उद्देश्यों को नुकसान पहुँचने की संभावना रहती है. इसलिए इससे बचना चाहिए.
भाषा के मुद्दे पर संघ प्रमुख ने दो-टूक बात कही कि अंग्रेजी कभी भी संघ की मुख्य संचार भाषा नहीं बनेगी. उन्होंने तर्क दिया कि अंग्रेजी हमारी अपनी भाषा नहीं है, इसलिए मातृभाषा को प्राथमिकता देना अनिवार्य है. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ व्यवहारिक सोच रखता है. जहां भारतीयों के साथ काम करने के लिए अंग्रेजी जरूरी होगी, वहां इसका उपयोग करने में कोई संकोच नहीं किया जाएगा. भागवत ने अंग्रेजी भाषा के कौशल में भी महारत हासिल करने का आह्वान किया.