pran pratishtha controversy Ram Mandir shubh muhurat know experts opinion: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा होनी है. प्राण प्रतिष्ठा को लेकर पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही कि क्या मंदिर निर्माण के अधूरे रहने पर प्राण प्रतिष्ठा किया जाना सही है? इसे लेकर संत समाज भी दो धड़े में बंट गया है. एक धड़ा का मानना है कि जब सब कुछ सतानत धर्म के मुताबिक ही हो रहा है. वहीं, दूसरे धड़े का मानना है कि मंदिर निर्माण के अधूरे रहने पर प्राण प्रतिष्ठा करने धर्मसम्मत नहीं है. इस दूसरे धड़े में चारों पीठों के शंकराचार्य भी शामिल हैं.
अब इन दोनों धड़ों की बातों पर गौर करें तो मिलीजुली प्रतिक्रिया आ रही है. किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले दोनों धड़ों का तर्क भी जान ही लीजिए. पहले धड़े का मानना है कि तीन फ्लोर के राम मंदिर के पहले फ्लोर का निर्माण हो चुका है, गर्भगृह का काम पूरा हो चुका है, ऐसे में प्राण प्रतिष्ठा किया जाना बिलकुल उचित है. वहीं, दूसरा धड़ा जो फिलहाल प्राण प्रतिष्ठा के पक्ष में नहीं है, उनका तर्क है कि मंदिर निर्माण अभी पूरा ही नहीं हुआ है, तो प्राण प्रतिष्ठा कैसे की जा सकती है?
अब एक जवाब और जान लीजिए कि आखिर राम मंदिर ट्रस्ट का मंदिर निर्माण को लेकर क्या कहना है? आखिर मंदिर निर्माण की स्थिति क्या है? इन दोनों सवालों के जवाब के तौर पर श्री राम मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि रामलला के तीन में से पहली मंजिल का निर्माण पूरा हो चुका है. गर्भगृह भी तैयार हो चुका है, जहां 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी. ट्रस्ट के मुताबिक, पहली मंजिल के निर्माणकार्य पूरा होने के बाद अगले दो फ्लोर का काम 2026 में पूरा किया जाएगा.
अब सवाल ये कि आखिर सच क्या है? क्या फिलहाल प्राण प्रतिष्ठा उचित है? क्या प्राण प्रतिष्ठा सनातन धर्म के अनुकूल नहीं है? इन सवालों के जवाब के लिए theindiadaily.com ने एक्सपर्ट्स से बात की.
भारत विद (Indologist) ललित मिश्रा के मुताबिक, इस पूरे मामले को लेकर हमारे शंकराचार्य ने जो सवाल उठाए हैं, उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा है कि ये शास्त्रीय दृष्टि, शास्त्रीय पद्धति के अनुसार नहीं है. अब शास्त्रीय दृष्टि से या फिर पद्धति से क्या ठीक नहीं है, उनका उन्होंने साक्ष्य नहीं दिया है. इसका कोई आधार अगर वो देते हैं, तो कोई बात समझ आती.
अब सवाल अगर मंदिर की अपूर्णता को लेकर उठाया जाए तो इसका शास्त्रों में कोई उल्लेख नहीं मिलता है कि तीन मंजिला मंदिर पूरी तरह से तैयार हो जाए, तब ही प्राण प्रतिष्ठा किया जाना उचित है. कई बार ऐसा देखा गया है कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही मंदिर का निर्माण पूरा किया गया है. इसमें गुजरात का सोमनाथ मंदिर, भोपाल का भोजपुर स्थित शिव मंदिर का नाम ले सकते हैं. इसके अलावा, उत्तराखंड में कई ऐसे मंदिर हैं, जो पूरी तरह से बने हुए नहीं हैं, लेकिन वहां प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है.
ललित मिश्रा ने विष्णुधर्मोत्तर पुराण और प्रतिष्ठा मयूख का हवाला देते हुए कहा कि हमारे गांव के मंदिर को ही ले लीजिए. पहला फ्लोर बनकर तैयार होता है और उसमें भगवान शंकर की प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाती है. इसके बाद आसपास जैसे-जैसे मंदिर का निर्माण होता है, अन्य भगवान की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है.
उन्होंने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा से संबंधित या फिर मूर्ति पूजा के नियमों से संबंधित शास्त्रों को मैंने सरसरी तौर पर देखा था, तो मुझे कहीं ये जिक्र नहीं मिला कि मंदिर पूरी तरह से तैयार होने के बाद ही प्राण प्रतिष्ठा किया जाना चाहिए. मथुरा के कई मंदिर ऐसे हैं, जहां एक मंदिर में कई देवताओं की मूर्ति है, जिनकी प्राण प्रतिष्ठा अलग-अलग समय पर की गई है. शंकराचार्य से अनुरोध है कि उन्होंने जिस प्राण प्रतिष्ठा को अशास्त्रीय करार दिया है, इस संबंध में साक्ष्य पेश करें.
कुछ अन्य एक्सपर्ट से बात की गई तो निष्कर्ष में ये निकला कि उन्होंने कहा कि वैसे तो निर्माण पूरा होने पर ही प्राण प्रतिष्ठा होनी चाहिए, लेकिन अधूरे मंदिर में भी प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है. हां, जहां भगवान विराजेंगे, वहां का निर्माण पूरा होना चाहिए, यानी गर्भगृह का निर्माण पूर्ण होना ही चाहिए. एक्सपर्ट्स ने कहा कि हम अपने आसपास देखते हैं कि कुछ सैंकड़ों साल पुराने मंदिर हैं, जहां मूर्तियां पहले से प्राण प्रतिष्ठित की गईं हैं.
मंदिर के पुराना होने के कारण कई बार उनका जिर्णोद्धार कराया जाता है, लेकिन वहां कोई अनिष्ट नहीं होता. ताजा मामला वाराणसी के काशी मंदिर का ही ले लीजिए. वहां पहले से प्राण प्रतिष्ठा की गई थी, लेकिन काशी मंदिर कॉरिडोर के तहत मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया. सब कुछ ठीक चल रहा है. ऐसे ही भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है, बाकी मंदिर का निर्माण कार्य चलता रहेगा.
हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, जब किसी नवनिर्मित मंदिर में मूर्ति रखी जाती है, तो उसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. इस दौरान मंत्रोच्चारण से जिस देवता या फिर देवी की मूर्ति है, उनका आह्वान किया जाता है, ताकि उस देवी या देवता का अंश उस मूर्ति में आ जाए.
कहा जाता है कि जब पहली बार नवनिर्मित मंदिर में मूर्ति लाई जाती है, तो उसकी आंखों पर कपड़ा बांधा जाता है. वैदिक मंत्रोच्चारण के जरिए आह्वान के बाद आंखों से पर्दा हटाने के पहले मूर्ति के चेहरे के सामने शीशा रखा जाता है. सभी विधि-विधान के पूरे होने के बाद मूर्ति की आंखों से जैसे कपड़ा हटाया जाता है, कहा जाता है कि सामने रखा शीशा टूट जाता है. माना जाता है कि मूर्ति में भगवान का अंश आ चुका है.
कुल मिलाकर नवनिर्मित मंदिर में रखी गई मूर्ति को जागृत करने की परंपरा या विधि को प्राण प्रतिष्ठा कहा जाता है. मान्यता है कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति में जीवन संचार होता है और वो देवता रूप में बदल जाता है.
दरअसल, किसी मंदिर के निर्माण के बाद मूर्ति को स्थापित किया जाता है. घर की बात छोड़ दी जाए तो मंदिर में रखी जाने वाली मूर्ति का प्राण प्रतिष्ठा जरूरी होता है. हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, मंदिर निर्माण के बाद रखी जाने वाली मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा के बाद देवी-देवता का वास हो जाता है.
दरअसल, अयोध्या के भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से पहले चारों शंकराचार्यों (कर्नाटक के श्रृंगेरी शारदा पीठ, गुजरात के द्वारका शारदा पीठ, उत्तराखंड के ज्योतिर पीठ और ओडिशा के गोवर्धन पीठ) ने ये कह दिया कि सनातन धर्म के अनुसार, मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए और भगवान राम के मंदिर का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है. चारों शंकराचार्यों के इस बयान के बाद विवाद छिड़ गया. चारों शंकराचार्यों ने यहां तक कह दिया कि वे प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं होंगे.
theindiadaily.com से बात करते हुए शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि हम चाहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का स्वागत होना चाहिए, सैंकड़ों वर्षों की समस्या का हल हुआ है, लेकिन ये भी चाहेंगे कि शास्त्रीय मर्यादा का पालन होना चाहिए. उन्होंने कहा कि चारों शंकराचार्यों ने कोई विरोध नहीं किया है, भगवान राम मंदिर के संबंध में कोई प्रश्न ही नहीं है. शास्त्रीय मर्यादा का उपदेश देने का काम शंकराचार्ययों का है, सभी कार्य शास्त्र विधि से होना चाहिए. अयोध्या जाएंगे, वाले सवाल पर शंकराचार्य ने कहा कि अभी वहां भीड़ है, थोड़ी भीड़ कम हो जाए. एक-दो महीने के बाद हम भी जाएंगे
संस्कृत विज्ञान पद्म विभूषण स्वामी रामभद्राचार्य महाराज की मानें तो प्राण प्रतिष्ठा समारोह शास्त्र के अनुसार हो रहा है. मंदिर का निर्माण पूरा हो चुका है, गर्भ गृह पूरा हो चुका है, इसलिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह अधार्मिक नहीं है.
राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास के मुताबिक, प्राण प्रतिष्ठा के लिए जो कुछ हो रहा है, सब शास्त्रों के अनुकूल है. उन्होंने कहा कि जहां रामलला को स्थापित किया जाना है, उस गर्भगृह का निर्माण पूरा हो चुका है, सिंहासन तैयार है, गुंबद तैयार है. ये सोचना की मंदिर का निर्माण अधूरा है, बिलकुल गलत सोच है.
श्री राम मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि रामलला के तीन में से पहली मंजिल बनकर तैयार है. बता दें कि गर्भगृह भी तैयार हो चुका है, जहां 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी. ट्रस्ट के मुताबिक, पहली मंजिल के निर्माणकार्य पूरा होने के बाद अगले दो फ्लोर का काम 2026 में पूरा किया जाएगा. प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर को रामभक्तों के लिए खोल दिया जाएगा.
भगवान श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी को की जाएगी. सभी शास्त्रीय परंपराओं का पालन करते हुए, प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम अभिजीत मुहूर्त में संपन्न किया जाएगा. प्राण प्रतिष्ठा के पहले शुभ संस्कारों का प्रारंभ आज यानी 16 जनवरी 2024 से होगा, जो 21 जनवरी, 2024 तक चलेगा.
अयोध्या में रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले आज यानी 16 जनवरी से धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो गए, जो एक हफ्ते तक यानी प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन तक किए जाएंगे.
16 जनवरी: प्रायश्चित्त और कर्मकूटि पूजन
17 जनवरी: मूर्ति का परिसर प्रवेश
18 जनवरी (शाम): तीर्थ पूजन, जल यात्रा, जलाधिवास और गंधाधिवास
19 जनवरी (सुबह): औषधाधिवास, केसराधिवास, घृताधिवास
19 जनवरी (शाम): धान्याधिवास
20 जनवरी (सुबह): शर्कराधिवास, फलाधिवास
20 जनवरी (शाम): पुष्पाधिवास
21 जनवरी (सुबह): मध्याधिवास
21 जनवरी (शाम): शय्याधिवास
बता दें कि इससे पहले गुजरात के सोमनाथ मंदिर के भी अधूरे रहने के बावजूद प्राण प्रतिष्ठा की गई थी. जब प्राण प्रतिष्ठा की गई थी, तब मंदिर के गर्भगृह का निर्माण नहीं हुआ था और मंदिर का शिखर भी नहीं बना था.
भोपाल में बेतवा नदी के किनारे पहाड़ी पर बना भगवान शंकर का मंदिर आज तक अधूरा है, लेकिन वहां प्राण प्रतिष्ठा किया गया है. भगवान शंकर का 22 फुट ऊंचा शिवलिंग है.