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जब राज्यपाल की रिपोर्ट से लगा राष्ट्रपति शासन! कहानी केंद्र की राजनीति बदलने वाले बड़े मामले की

भारत में कई बार राज्यपालों की रिपोर्ट राष्ट्रपति शासन और राज्य सरकारों के भविष्य का आधार बनी. केरल से कर्नाटक तक ऐसे मामलों ने केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित किया. एस.आर. बोम्मई मामले ने बहुमत परीक्षण और संघीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत तय किए.

KanhaiyaaZee
जब राज्यपाल की रिपोर्ट से लगा राष्ट्रपति शासन! कहानी केंद्र की राजनीति बदलने वाले बड़े मामले की
Courtesy: AI Generated

भारतीय राजनीति में कई बार सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका चुनावी रैली, संसद की बहस या किसी बड़े नेता के बयान से नहीं हुआ. कई बार इसकी शुरुआत एक ऐसी रिपोर्ट से हुई, जो राजभवन से निकलकर दिल्ली पहुंची.

कुछ पन्नों की एक रिपोर्ट, राज्यपाल की राय. और उसके बाद केंद्र सरकार के सामने ऐसा फैसला, जिसका असर सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहा. कभी किसी निर्वाचित सरकार को हटाने की सिफारिश हुई. कभी राष्ट्रपति शासन लागू हुआ. कभी राज्य की विधानसभा भंग कर दी गई. और कुछ मामलों में राज्यपाल की रिपोर्ट पर उठे सवाल इतने बड़े हो गए कि आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को संविधान की व्याख्या करनी पड़ी.

भारत के राजनीतिक इतिहास में राज्यपाल की रिपोर्ट केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रही है. कई मौकों पर उसने केंद्र और राज्य के रिश्तों, दिल्ली की सत्ता और भारतीय संघवाद की दिशा तक को प्रभावित किया है.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक समय ऐसा भी आया, जब राज्यपाल की एक रिपोर्ट के आधार पर कर्नाटक की सरकार हटा दी गई. मामला अदालत पहुंचा और फिर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने पूरे देश में राष्ट्रपति शासन लागू करने के नियमों को बदलकर रख दिया.

यह कहानी है उन्हीं रिपोर्टों की, जो कभी सत्ता बदलने का आधार बनीं और कभी सत्ता की मनमानी पर संवैधानिक ब्रेक लगाने की वजह.

आखिर राज्यपाल की रिपोर्ट इतनी महत्वपूर्ण क्यों होती है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 कहता है कि यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या किसी अन्य माध्यम से यह संतोष हो जाए कि किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो राष्ट्रपति उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकते हैं.

यानी राज्यपाल की रिपोर्ट राष्ट्रपति शासन लगाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण आधार बन सकती है. लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना आवश्यक है. राज्यपाल की रिपोर्ट अपने आप किसी सरकार को नहीं हटाती.

संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 के तहत घोषणा करते हैं और इसके पीछे केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद की भूमिका होती है. राज्यपाल की रिपोर्ट उस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सामग्री या आधार हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने भी एस.आर. बोम्मई मामले में स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 356 की शक्ति राष्ट्रपति के माध्यम से प्रयोग होती है, राज्यपाल के पास किसी निर्वाचित सरकार को सीधे हटाने की स्वतंत्र शक्ति नहीं होती.

लेकिन इतिहास बताता है कि कई बार राजभवन से दिल्ली भेजी गई रिपोर्ट ने राजनीतिक घटनाओं की पूरी दिशा बदल दी.

1959: जब केरल की सरकार को हटाने ने पूरे देश में बहस छेड़ दी

राज्यपाल की रिपोर्ट और केंद्र के हस्तक्षेप से जुड़ी सबसे चर्चित शुरुआती घटनाओं में 1959 का केरल संकट शामिल है. 1957 में ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद के नेतृत्व में केरल में कम्युनिस्ट सरकार बनी थी. यह लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सत्ता में आने वाली दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकारों में से एक मानी जाती है.

लेकिन सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक आंदोलन शुरू हुआ. आखिरकार 1959 में केंद्र ने अनुच्छेद 356 के तहत केरल सरकार को बर्खास्त कर दिया. इस फैसले ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा किया कि क्या केंद्र किसी राज्य की निर्वाचित सरकार को राजनीतिक और प्रशासनिक संकट के आधार पर हटा सकता है, जबकि सरकार विधानसभा में बहुमत रखती हो?

बाद के दशकों में यही सवाल बार-बार अलग-अलग राज्यों में सामने आया. संसद में हुई बहसों और बाद के संवैधानिक विश्लेषणों में भी केरल का मामला अनुच्छेद 356 के विवादित इस्तेमाल के शुरुआती बड़े उदाहरणों में गिना गया.

1977 और 1980: जब दिल्ली में सरकार बदली तो राज्यों की सरकारें भी बदल गईं

राज्यपालों की रिपोर्ट और राष्ट्रपति शासन की राजनीति को समझने के लिए 1977 और 1980 के घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण हैं. 1977 में आपातकाल के बाद केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी. इसके बाद कांग्रेस शासित नौ राज्यों की सरकारों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए. फिर राष्ट्रपति शासन और विधानसभा भंग करने का दौर शुरू हुआ.

तीन साल बाद तस्वीर पलट गई. 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई और इस बार गैर-कांग्रेसी सरकारों वाले राज्यों पर संकट आ गया. कई राज्यों में फिर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया.

सरकारें बदलती रहीं, लेकिन सवाल वही बना रहा कि क्या लोकसभा चुनाव में केंद्र की सत्ता बदलने का मतलब यह है कि राज्यों की निर्वाचित सरकारों को भी नया जनादेश लेना चाहिए?

सरकारिया आयोग के अध्ययन में भी 1977 और 1980 में बड़े पैमाने पर अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को गंभीर संवैधानिक बहस का विषय बताया गया. आयोग के रिकॉर्ड में यह उल्लेख मिलता है कि दोनों मौकों पर नौ-नौ राज्यों की सरकारों को लेकर बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई और इसकी संवैधानिक उपयुक्तता पर व्यापक सवाल उठे. यही वह दौर था, जब राज्यपाल के पद को लेकर विपक्षी दलों का संदेह और गहरा हुआ.

फिर आया कर्नाटक का मामला, जिसने इतिहास बदल दिया

1989 में कर्नाटक में मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई की सरकार राजनीतिक संकट से गुजर रही थी. कुछ विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस लेने की बात कही. इसके बाद राज्यपाल पी. वेंकटसुब्बैया ने केंद्र को रिपोर्ट भेजी कि सरकार विधानसभा में बहुमत खो चुकी है. यहीं से कहानी ने बड़ा मोड़ लिया.

बोम्मई का कहना था कि उन्हें विधानसभा के पटल पर बहुमत साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए. उनके समर्थन को लेकर स्थिति भी बदल रही थी और कुछ विधायकों ने बाद में अपने पहले के रुख पर सवाल उठाए, लेकिन सरकार को विधानसभा में शक्ति परीक्षण का मौका नहीं मिला.

21 अप्रैल 1989 को अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया. एक राज्यपाल की रिपोर्ट ने कर्नाटक की सरकार का भविष्य तय कर दिया था, लेकिन यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ.

एस.आर. बोम्मई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और पांच साल बाद आया वह फैसला, जिसने भारतीय राजनीति में राज्यपाल की रिपोर्ट और राष्ट्रपति शासन की पूरी बहस को नई दिशा दे दी.

एस.आर. बोम्मई केस: जब सुप्रीम कोर्ट ने तय किया सत्ता का नया नियम

11 मार्च 1994 को सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इस फैसले का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश था- किसी सरकार के बहुमत पर संदेह होने की स्थिति में सामान्य नियम के तौर पर उसका परीक्षण विधानसभा के पटल पर होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं है. यानी केंद्र सरकार सिर्फ 'संवैधानिक संकट' कहकर किसी राज्य की निर्वाचित सरकार को मनमाने तरीके से नहीं हटा सकती.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सरकारिया आयोग की सिफारिशों और अनुच्छेद 356 के बार-बार इस्तेमाल पर भी विस्तार से चर्चा हुई. अदालत ने माना कि यह शक्ति संविधान में असाधारण परिस्थितियों के लिए है और इसके प्रयोग की जांच की जा सकती है.

बाद के संवैधानिक विश्लेषणों में इस फैसले को भारतीय संघवाद की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया. इसने अनुच्छेद 356 के राजनीतिक दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण सीमाएं तय कीं.

एक रिपोर्ट से बदला सिर्फ कर्नाटक नहीं, बदले पूरे देश के नियम

एस.आर. बोम्मई मामले की सबसे बड़ी खासियत यही थी. शुरुआत एक राज्य के राजनीतिक संकट से हुई थी. राज्यपाल ने रिपोर्ट भेजी, केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और फैसले ने पूरे भारत के लिए एक संवैधानिक सिद्धांत तय कर दिया. 

अब राज्यपाल की रिपोर्ट को अंतिम राजनीतिक फैसला नहीं माना जा सकता था. अगर किसी मुख्यमंत्री के बहुमत पर सवाल है, तो सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा में शक्ति परीक्षण सबसे महत्वपूर्ण तरीका बन गया. यही कारण है कि आज भी जब किसी राज्य में सरकार गिरने या बहुमत खोने का विवाद पैदा होता है, तो सबसे पहले एक शब्द सुनाई देता है- फ्लोर टेस्ट. यह राजनीतिक शब्द भले लगता हो, लेकिन इसके पीछे भारतीय लोकतंत्र की लंबी संवैधानिक लड़ाई है.

सरकारिया आयोग ने भी उठाए थे गंभीर सवाल

राज्यपालों की भूमिका और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर बढ़ते विवादों के बीच 1983 में सरकारिया आयोग का गठन किया गया. आयोग का काम केंद्र और राज्यों के संबंधों की समीक्षा करना था. अनुच्छेद 356 और राज्यपाल की भूमिका इस बहस के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल थे. सरकारिया आयोग ने अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को अंतिम विकल्प के रूप में देखने की सिफारिश की.

आयोग का मूल संदेश था कि निर्वाचित राज्य सरकार को हटाना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनना चाहिए. इस असाधारण शक्ति का इस्तेमाल बेहद सावधानी और अंतिम उपाय के तौर पर होना चाहिए. यह सिफारिश इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि तब तक अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कई दर्जन बार हो चुका था.

सुप्रीम कोर्ट ने भी बोम्मई फैसले में टिप्पणी की थी कि संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 356 को 90 से अधिक अवसरों पर इस्तेमाल किया जा चुका था और सरकारिया आयोग ने इसके प्रयोग के तरीके पर गंभीर चिंता जताई थी.

क्या राज्यपाल सिर्फ केंद्र के प्रतिनिधि होते हैं?

यहीं भारतीय राजनीति का सबसे विवादित सवाल सामने आता है. राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं, लेकिन उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और व्यवहार में नियुक्ति केंद्र सरकार की सलाह पर होती है. इसी वजह से जब राज्यपाल और किसी विपक्षी दल की राज्य सरकार के बीच टकराव होता है, तो राजनीतिक आरोप तेजी से सामने आते हैं.

राज्य सरकार कहती है कि राजभवन केंद्र की राजनीतिक इच्छा के अनुसार काम कर रहा है. दूसरी तरफ केंद्र का तर्क हो सकता है कि राज्यपाल संविधान की रक्षा की अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं. यह विवाद नया नहीं है.

राज्यपालों की रिपोर्ट से जुड़े मामलों का इतिहास बताता है कि असली विवाद अक्सर रिपोर्ट की भाषा से ज्यादा उसके पीछे मौजूद राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर होता है.

आज भी क्यों प्रासंगिक है यह कहानी?

क्योंकि भारत की राजनीति में गठबंधन सरकारें, दल-बदल, बहुमत के विवाद और केंद्र-राज्य टकराव खत्म नहीं हुए हैं. आज भी जब किसी राज्य में सरकार के बहुमत पर सवाल उठता है, राज्यपाल की भूमिका अचानक राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकती है. लेकिन 1989 के कर्नाटक संकट और 1994 के एस.आर. बोम्मई फैसले के बाद राजनीतिक और संवैधानिक माहौल बदल चुका है. अब किसी राज्य सरकार को हटाने का सवाल केवल राजभवन की रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहता. उस पर अदालत की नजर भी हो सकती है.

और सबसे महत्वपूर्ण बात- बहुमत की असली परीक्षा विधानसभा में होने के सिद्धांत को भारतीय लोकतंत्र में मजबूत संवैधानिक आधार मिल चुका है.

एस.आर. बोम्मई मामले से निकली सबसे बड़ी सीख यही रही कि लोकतांत्रिक बहुमत का सबसे विश्वसनीय परीक्षण सदन के भीतर होता है. इसलिए कई बार राजभवन से दिल्ली पहुंची एक रिपोर्ट ने केवल किसी मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं बदली. उसने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी. और कुछ मामलों में, उसी रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद आगे चलकर ऐसा संवैधानिक फैसला बन गया, जिसने केंद्र की सत्ता की सीमाएं हमेशा के लिए तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.