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1967 का चुनाव: जब कांग्रेस सत्ता में रहकर भी हार गई, बदल गया राजनीति का सिद्धांत

1967 का चुनाव भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ था. कांग्रेस ने केंद्र में बहुमत बचाया, लेकिन नौ राज्यों में सत्ता गंवाई. DMK और विपक्षी गठबंधनों के उभार ने एकदलीय प्रभुत्व को चुनौती दी और गठबंधन राजनीति की नींव मजबूत की.

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1967 का चुनाव: जब कांग्रेस सत्ता में रहकर भी हार गई, बदल गया राजनीति का सिद्धांत
Courtesy: AI Generated

1967 का चौथा लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सिर्फ एक चुनाव नहीं था. कांग्रेस ने केंद्र में बहुमत हासिल कर लिया था और इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन इसी चुनाव ने पहली बार यह दिखा दिया कि देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी को राज्यों में चुनौती दी जा सकती है. नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, क्षेत्रीय दलों और गठबंधन राजनीति का प्रभाव बढ़ा और भारतीय राजनीति में एक-दलीय प्रभुत्व के दौर को पहली बड़ी चोट लगी.

1967 का चुनाव इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

आज जब केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकार होना सामान्य राजनीतिक घटना लगती है, तब 1967 का भारत बिल्कुल अलग था. 1952 में पहले आम चुनाव से लेकर 1962 तक कांग्रेस देश की राजनीति पर लगभग पूरी तरह हावी रही थी. लोकसभा में उसका बहुमत बहुत मजबूत था और अधिकांश राज्यों में भी कांग्रेस की सरकारें थीं, लेकिन 1967 के चौथे आम चुनाव ने इस राजनीतिक व्यवस्था की नींव को पहली बार गंभीर चुनौती दी.

17 से 21 फरवरी 1967 के बीच हुए चुनाव में लोकसभा की 520 सीटों पर मतदान हुआ. कांग्रेस को 283 सीटें मिलीं. यानी पार्टी केंद्र में बहुमत बचाने में कामयाब रही, लेकिन 1962 में मिली 361 सीटों के मुकाबले उसकी ताकत 78 सीट कम हो गई. कांग्रेस का वोट शेयर भी करीब 44.7 फीसदी से घटकर 40.78 फीसदी रह गया.

नेहरू के बाद पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा

1967 का चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी असाधारण था क्योंकि यह पहला आम चुनाव था जो जवाहरलाल नेहरू के बिना हुआ. नेहरू का निधन मई 1964 में हुआ था. उनके बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, लेकिन जनवरी 1966 में उनके निधन के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं.

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस के भीतर भी शक्ति-संतुलन को लेकर खींचतान शुरू हो गई थी. पार्टी के पुराने प्रभावशाली नेताओं के समूह, जिसे बाद में राजनीतिक विमर्श में “सिंडिकेट” कहा गया, और इंदिरा गांधी के बीच संबंध सहज नहीं थे. 1966 में इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के लिए मुकाबला भी हुआ था. इंदिरा गांधी विजयी हुईं, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी स्थिति अभी पूरी तरह मजबूत नहीं थी. ऐसे माहौल में 1967 का चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व की पहली बड़ी राष्ट्रीय परीक्षा बन गया.

जनता के बीच नाराजगी क्यों बढ़ रही थी?

1967 का चुनाव किसी एक मुद्दे का चुनाव नहीं था. इसके पीछे कई आर्थिक और राजनीतिक कारण एक साथ काम कर रहे थे. 1960 के दशक के मध्य तक देश आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था. खाद्यान्न की कमी, महंगाई, बेरोजगारी और सूखे जैसी समस्याओं ने आम लोगों को प्रभावित किया. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और उससे पहले 1962 के चीन युद्ध ने भी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया था. 1961-66 की तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान आर्थिक विकास सरकार के निर्धारित लक्ष्य से काफी पीछे रह गया. इसके अलावा कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी ने भी पार्टी की चुनावी स्थिति को कमजोर किया.

यानी 1967 में जनता के सामने सिर्फ सरकार का कामकाज नहीं था. कांग्रेस के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व के खिलाफ धीरे-धीरे बन रहा असंतोष भी वोट में बदल रहा था. लेकिन सबसे बड़ा बदलाव लोकसभा में नहीं, राज्यों में हुआ और यही 1967 की सबसे दिलचस्प कहानी है.

केंद्र में कांग्रेस को बहुमत मिल गया, लेकिन राज्यों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई.

NCERT के अनुसार, कांग्रेस ने सात राज्यों में अपना बहुमत खो दिया, जबकि दो अन्य राज्यों में दलबदल के कारण वह सरकार नहीं बना सकी. इस तरह कुल नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई.

ये राज्य थे:

  1. पंजाब
  2. हरियाणा
  3. उत्तर प्रदेश
  4. मध्य प्रदेश
  5. बिहार
  6. पश्चिम बंगाल
  7. ओडिशा
  8. मद्रास
  9. केरल

यानी दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बनी रही, लेकिन देश के एक बड़े हिस्से में लोगों ने पहली बार कांग्रेस के अलावा दूसरे राजनीतिक विकल्पों को सत्ता तक पहुंचाया. इसीलिए 1967 को भारतीय राजनीति में “टर्निंग पॉइंट” माना जाता है. एक तरफ कांग्रेस, दूसरी तरफ अलग-अलग विचारधाराओं का विपक्ष

1967 से पहले कांग्रेस के सामने विपक्ष मौजूद जरूर था, लेकिन विपक्षी दल अक्सर एक-दूसरे के भी विरोधी थे. 1967 में तस्वीर बदलने लगी. समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और क्षेत्रीय दलों ने कई जगह कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए आपसी सहयोग किया. इस राजनीति को उस समय समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के विचार “गैर-कांग्रेसवाद” से भी बल मिला.

इस विचार का मूल तर्क था कि अलग-अलग विचारधारा रखने वाली विपक्षी पार्टियां अपने मतभेद कुछ समय के लिए किनारे रखकर कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो सकती हैं. 1967 के चुनावों ने इस रणनीति को जमीन पर सफल होते हुए दिखाया.

'संयुक्त विधायक दल' और गठबंधन राजनीति का नया दौर

जहां किसी एक विपक्षी दल को बहुमत नहीं मिला, वहां कई दलों ने मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की. इन्हें अलग-अलग राज्यों में संयुक्त विधायक दल (SVD) जैसे गठबंधनों के रूप में जाना गया. यह भारतीय राजनीति के लिए एक नया अनुभव था. पहले जहां एक पार्टी का स्पष्ट बहुमत सामान्य बात थी, वहीं अब अलग-अलग विचारधाराओं के विधायक एक साथ सरकार बनाने लगे. उत्तर भारत के कई राज्यों में ऐसी सरकारें बनीं.

राजनीति विज्ञान के विद्वान पॉल आर. ब्रास के अनुसार, 1967 के बाद भारतीय राजनीति एक ऐसे चरण में पहुंची जहां पहले से प्रभुत्वशाली कांग्रेस के बजाय विभिन्न दलों और गठबंधनों के बीच सत्ता हस्तांतरण की समस्या सामने आई. यही आगे चलकर भारत में गठबंधन राजनीति की प्रयोगशाला बनने की शुरुआत थी.

तमिलनाडु में हुआ सबसे बड़ा राजनीतिक प्रयोग

1967 की कहानी में मद्रास राज्य, जिसे बाद में तमिलनाडु कहा गया, का चुनाव विशेष महत्व रखता है. यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया. DMK ने विधानसभा की 234 सीटों में से 137 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस सिर्फ 51 सीटों पर सिमट गई. DMK के सहयोगियों को मिलाकर गठबंधन ने 179 सीटें हासिल कीं.

यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था. यह इस बात का संकेत था कि क्षेत्रीय पहचान और क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दल के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती दे सकते हैं.

DMK की सफलता के पीछे द्रविड़ आंदोलन की लंबी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सामाजिक न्याय के मुद्दे और हिंदी को लेकर चल रहे विरोध आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका थी. NCERT भी 1967 में DMK की जीत को हिंदी-विरोधी आंदोलन और क्षेत्रीय राजनीति के उभार से जोड़ता है.

इसके साथ एक और महत्वपूर्ण घटना हुई. कांग्रेस के दिग्गज नेता के. कामराज अपने चुनाव क्षेत्र में हार गए. कामराज सिर्फ तमिलनाडु के बड़े नेता नहीं थे, बल्कि वे कांग्रेस संगठन के राष्ट्रीय स्तर पर बेहद प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे. उनकी हार ने यह संदेश दिया कि कांग्रेस के पुराने राजनीतिक दिग्गज भी अब चुनावी चुनौती से सुरक्षित नहीं हैं.

सिर्फ कामराज ही नहीं, कई बड़े नेता हारे

1967 का चुनाव कांग्रेस के कई दिग्गजों के लिए बेहद खराब रहा. के. कामराज के अलावा एस. के. पाटिल, अतुल्य घोष और के. बी. सहाय जैसे प्रमुख कांग्रेस नेता भी चुनाव हार गए. NCERT के अनुसार, इंदिरा गांधी की कैबिनेट के लगभग आधे मंत्री भी चुनाव में हार गए थे. इससे कांग्रेस के भीतर यह सवाल पैदा हुआ कि क्या पार्टी की पुरानी चुनावी मशीनरी और नेतृत्व शैली बदलते राजनीतिक माहौल में काम कर पाएगी?

लोकसभा में भी कांग्रेस को बड़ा झटका

केंद्र में कांग्रेस की सरकार जरूर बनी, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन उसके पिछले रिकॉर्ड की तुलना में काफी कमजोर था. 1962 में कांग्रेस ने 361 सीटें जीती थीं. 1967 में यह संख्या घटकर 283 रह गई. दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने अपनी स्थिति मजबूत की.

स्वतंत्र पार्टी 44 सीटों के साथ लोकसभा में प्रमुख विपक्षी ताकतों में उभरी. भारतीय जनसंघ ने 35 सीटें जीतीं. DMK ने 25 सीटें हासिल कीं, जबकि समाजवादी और कम्युनिस्ट दलों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.

इसका मतलब यह नहीं था कि कांग्रेस केंद्र में कमजोर अल्पमत सरकार बन गई थी. 283 सीटों के साथ उसके पास स्पष्ट बहुमत था. लेकिन फर्क यह था कि पहली बार कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व अजेय नहीं दिख रहा था.

'एक पार्टी की सरकार' से 'गठबंधन के दौर' तक

1967 से पहले कांग्रेस की राजनीति को समझने के लिए एक शब्द अक्सर इस्तेमाल किया जाता है- कांग्रेस सिस्टम. कांग्रेस सिर्फ एक पार्टी नहीं थी. उसके भीतर अलग-अलग सामाजिक समूह, क्षेत्रीय नेता, विचारधाराएं और राजनीतिक गुट मौजूद थे. इसलिए बहुत से राजनीतिक विरोध भी कांग्रेस के अंदर ही समा जाते थे. लेकिन 1967 के बाद यह व्यवस्था कमजोर होने लगी. विरोधी समूहों और क्षेत्रीय शक्तियों को कांग्रेस के बाहर राजनीतिक मंच मिलने लगा.

इसका परिणाम सिर्फ तत्कालीन सरकारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ा, गठबंधन सरकारों के प्रयोग बढ़े, विधायकों के दलबदल ने सरकारों की स्थिरता को प्रभावित किया, केंद्र और राज्यों की राजनीति के बीच दूरी बढ़ी और कांग्रेस के अंदर नेतृत्व संघर्ष तेज हुआ. इसलिए 1967 को बाद की गठबंधन राजनीति की शुरुआती प्रयोगशाला कहना ज्यादा उचित होगा.

'आया राम, गया राम' की राजनीति भी इसी दौर में सामने आई

1967 के बाद राज्यों में सरकारें बनाने और बचाने के लिए विधायकों की भूमिका अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो गई. कई जगह सरकारें बेहद कम अंतर से बहुमत में थीं. ऐसे में विधायकों का एक दल से दूसरे दल में जाना सरकार के अस्तित्व का सवाल बन सकता था. यहीं से भारतीय राजनीति में दलबदल की राजनीति को एक नया रूप मिला.

हरियाणा के विधायक गया लाल से जुड़ा 1967 का प्रसिद्ध प्रसंग बाद में 'आया राम, गया राम' मुहावरे के रूप में लोकप्रिय हुआ. यह सिर्फ एक मजेदार राजनीतिक मुहावरा नहीं था. इसके पीछे उस दौर की अस्थिर गठबंधन राजनीति की गंभीर समस्या छिपी थी.

1967 के बाद सरकारों के बनने-बिगड़ने में दलबदल इतना महत्वपूर्ण हो गया कि आने वाले दशकों में दलबदल रोकने के लिए संवैधानिक और कानूनी उपायों की जरूरत महसूस हुई.

क्या 1967 में कांग्रेस पूरी तरह हार गई थी?

नहीं, कांग्रेस ने लोकसभा में बहुमत हासिल किया था. इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रहीं. सही बात यह है कि 1967 में कांग्रेस केंद्र में जीती, लेकिन उसके राजनीतिक प्रभुत्व की अजेयता टूट गई. यही वजह है कि इस चुनाव का वास्तविक प्रभाव उसके तत्कालीन लोकसभा परिणाम से कहीं ज्यादा बड़ा था.

फिर 1967 को 'राजनीतिक भूकंप' क्यों कहा गया?

चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसकी तुलना “राजनीतिक भूकंप” से की. कारण साफ था. एक ऐसी पार्टी जो आजादी के बाद लगातार केंद्र में सत्ता में थी, जिसने लगभग पूरे देश में अपनी संगठनात्मक पकड़ बना रखी थी, वह पहली बार इतने बड़े पैमाने पर राज्यों में सत्ता से बाहर हुई. NCERT भी दर्ज करता है कि समकालीन पर्यवेक्षकों ने 1967 के परिणामों को 'political earthquake' कहा था.

यह बदलाव इतना व्यापक था कि उस दौर में एक कहावत चल पड़ी कि दिल्ली से हावड़ा जाने वाली ट्रेन से सफर करने पर शायद ही कोई कांग्रेस-शासित राज्य मिले. यह उस समय के राजनीतिक माहौल की व्यापकता बताने वाला लोकप्रिय वर्णन था, न कि कोई आधिकारिक राजनीतिक आंकड़ा.

1967 के बाद कांग्रेस ने भी बदली अपनी राजनीति

1967 के झटके के बाद कांग्रेस के सामने सिर्फ विपक्ष की चुनौती नहीं थी. पार्टी के भीतर भी सत्ता और संगठन को लेकर संघर्ष तेज हुआ. इंदिरा गांधी और कांग्रेस के पुराने संगठनात्मक नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ते गए.

आखिरकार 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ. इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला गुट और संगठन के पुराने नेताओं से जुड़ा गुट अलग-अलग रास्तों पर चले गए.

इस तरह देखा जाए तो 1967 ने वह राजनीतिक जमीन तैयार की जिस पर 1969 का कांग्रेस विभाजन और 1971 की इंदिरा गांधी की निर्णायक वापसी जैसी घटनाएं आगे हुईं.

हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि 1967 ने अकेले 1969 के विभाजन को जन्म दिया. कांग्रेस के भीतर मतभेद पहले से मौजूद थे और बाद की घटनाओं ने उन्हें और गहरा किया.

1967 ने भारतीय राजनीति को क्या सिखाया?

1967 के चुनाव की सबसे बड़ी विरासत शायद यह थी कि भारतीय मतदाता ने पहली बार राष्ट्रीय राजनीति को एक स्पष्ट संदेश दिया कि सत्ता में रहना स्थायी अधिकार नहीं है. कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत, आजादी के आंदोलन की विरासत और नेहरू का राजनीतिक प्रभाव इतना बड़ा था कि शुरुआती चुनावों में उसके सामने विपक्ष बेहद कमजोर दिखाई देता था.

लेकिन 1967 ने दिखाया कि क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों पर भारी पड़ सकते हैं, अलग-अलग विचारधारा वाले दल भी चुनावी रणनीति के लिए साथ आ सकते हैं,
एक लोकप्रिय राष्ट्रीय पार्टी राज्यों में हार सकती है, भले ही केंद्र में सत्ता बचा ले और मतदाता एक ही चुनाव में केंद्र और राज्य के लिए अलग राजनीतिक संदेश दे सकता है.

आज भारत की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका, गठबंधन सरकारें, सीटों का बंटवारा, राज्य-केंद्र के अलग राजनीतिक समीकरण और चुनावी गठजोड़ सामान्य बातें हैं. इन सबकी जड़ें अलग-अलग ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में हैं, लेकिन 1967 का चुनाव इस बदलाव का एक निर्णायक पड़ाव था.

यही वह चुनाव था जब कांग्रेस का एकछत्र राजनीतिक प्रभुत्व पहली बार बड़े पैमाने पर चुनौती में बदला. केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी रही, लेकिन राज्यों में विपक्षी दलों ने सत्ता का स्वाद चखा. मद्रास में DMK की जीत ने क्षेत्रीय दलों की ताकत दिखाई. उत्तर भारत में गठबंधन सरकारों ने नए राजनीतिक प्रयोग किए. और दलबदल की राजनीति ने आगे चलकर भारतीय चुनावी व्यवस्था को बदलने वाली बहस को जन्म दिया.