संसद सत्र चलाने में टैक्सपेयर्स का कितना पैसा खर्च होता है? सरकार ने RTI का जवाब देने से किया इनकार
केंद्र सरकार ने आरटीआई के तहत संसद सत्र चलाने और हंगामे के कारण टैक्सपेयर्स के पैसों के नुकसान की जानकारी देने से इनकार कर दिया है, जिससे नया विवाद खड़ा हो गया है.
केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार (RTI) के तहत यह जानकारी सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है कि संसद सत्र चलाने पर कुल कितना खर्च आता है और हंगामे के कारण टैक्सपेयर्स का कितना नुकसान होता है. एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान 'मिंट' द्वारा 13 अगस्त को दायर एक आरटीआई के जवाब में राज्यसभा सचिवालय ने 2 सितंबर को कहा कि मांगी गई जानकारी आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 2(f) के तहत 'सूचना' की परिभाषा में नहीं आती है. लोकसभा सचिवालय के जवाब का अभी इंतजार है.
आरटीआई कानून में 'सूचना' की परिभाषा
आरटीआई अधिनियम की धारा 2(f) के तहत 'सूचना' का अर्थ किसी भी रूप में उपलब्ध सामग्री से है. इसमें रिकॉर्ड, दस्तावेज, मेमो, ई-मेल, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, सर्कुलर, ऑर्डर, डेटा सामग्री या अनुबंध आदि शामिल होते हैं. हालांकि, सचिवालय ने व्यवधान के कारण हुए वित्तीय नुकसान के आंकड़े को इस कानूनी दायरे से बाहर माना है.
मानसून सत्र 2026 में कामकाज का हाल
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब संसद के हालिया मानसून सत्र 2026 (20 जुलाई से 13 अगस्त 2026) में भारी हंगामा हुआ था. दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर विपक्ष के विरोध के कारण कार्यवाही बुरी तरह प्रभावित हुई. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार, इस सत्र में लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही, जहां 12 में से 11 विधेयक बिना किसी चर्चा के पारित कर दिए गए.
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लोकसभा में 79 घंटे से अधिक का समय बर्बाद
लोकसभा की आधिकारिक वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार, हंगामे और बार-बार स्थगन के कारण कुल 79 घंटे 34 मिनट का समय नष्ट हुआ. इस सत्र में कुल बैठक का समय मात्र 17 घंटे 32 मिनट दर्ज किया गया, जो 18वीं लोकसभा के अब तक के सभी आठ सत्रों में सबसे कम है. इस भारी समय बर्बादी के बाद जनता के पैसों के नुकसान को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
क्या हर मिनट का खर्च 2.5 लाख रुपये है?
संसद में व्यवधान के कारण होने वाले नुकसान को लेकर लंबे समय से 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट का आंकड़ा चर्चा में रहता है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी और राज्यसभा सांसद विक्रमजीत साहनी जैसे कई दिग्गजों ने दावा किया है कि संसद चलाने में करदाताओं के 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट खर्च होते हैं. हालांकि, इस आंकड़े का कोई आधिकारिक सरकारी स्रोत उपलब्ध नहीं है.
आंकड़ों का इतिहास
थिंक टैंक 'पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च' के अनुसार, 2008 के एक लोकसभा चर्चा पत्र में पहली बार संसद का खर्च 29,000 रुपये प्रति मिनट आंका गया था. इसके बाद 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल ने इस खर्च को 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट बताया था. पीआरएस ने स्पष्ट किया कि इन आंकड़ों की गणना का कोई सटीक तरीका उपलब्ध नहीं है और संसद के विधायी कामकाज को केवल मौद्रिक मूल्य में आंकना व्यावहारिक रूप से कठिन है.