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Electoral Bonds: SBI को नहीं मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा बढ़ाने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने आज भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की उस याचिका पर सुनवाई कि जिसमें उसने चुनावी बांड की जानकारी चुनाव आयोग को देने की समयसीमा 30 जून तक बढ़ाने की मांग की थी.

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Electoral Bonds: SBI को नहीं मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा बढ़ाने से किया इनकार

Electoral Bonds: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक को झटका देते हुए उससे तुरंत चुनावी बांड की जानकारी चुनाव आयोग को देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने एसबीआई से कहा कि आपको 12 मार्च तक चुनाव आयोग को चुनावी बांड की जानकारी देनी होगी. इसके अलावा कोर्ड ने चुनाव आयोग से चुनावी बांड की जानकारी को 15 मार्च तक सार्वजनिक करने को कहा. कोर्ट ने बैंक से कहा कि आपको सिर्फ सीलबंद लिफाफा खोलना है, जानकारी जुटानी है और इस जानकारी को चुनाव आयोग को देना है, इसमें क्या आपत्ति है.

'26 दिनों में आपने क्या कदम उठाए'

मामले की सुनवाई करते हुए सीजेआई डी.वाई चंद्रचूड़ ने SBI की ओर से पेश हुए वकील हरीश साल्वे से कहा कि हमने 15 फरवरी को फैसला दिया था और आज 11 मार्च है, बीते 26 दिनों में आपने क्या कदम उठाए? उन्होंने आगे कहा कि जानकारी जमा करने की समयसीमा खत्म होने से दो दिन पहले एसबीआई ने कोर्ट के समक्ष एक विविध आवेदन दायर किया और निर्देशों का पालन करने के लिए समयसीमा को 30 जून तक बढ़ाने की मांग की.

कोर्ट ने अपने निर्देश में क्या-क्या कहा, पढ़ें

  •  पिछले 26 दिनों में आपने क्या किया, इस पर अपना जवाब दें.
  • कोर्ट ने कहा कि जब आप इस तरह समय सीमा बढ़ाने की बात कहते हैं तो यह एक गंभीर मामला है. हमारा फैसला एकदम स्पष्ट है.
  •  आपको केवल सील बंद लिफाफा खोलना है, जानकारी जुटानी है और उसे चुनाव आयोग को देना है.
  •  आप इस देश के नंबर 1 बैंक हैं, हम उम्मीद करते हैं कि आप आगे आएं और जानकारी दें.

हमें जानकारी देने में कोई समस्या नहीं- हरीश साल्वे

इस पर हरीश साल्वे ने कहा कि बांड किसने खरीदे, हमारे पास इसकी पूरी डिटेल है. हमारे पास यह भी जानकारी है कि किस राजनीतिक दल ने इसे भुनाया. हमें जानकारी देने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन हमें विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के लिए थोड़ा और समय चाहिए. इस पर कोर्ट ने कहा कि हम और समय नहीं दे सकते, निर्देश का तत्काल पालन करते हुए चुनावी बांड की जानकारी तुरंत चुनाव आयोग को दी जाए. बता दें कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड को असंवैधानिक करार देते हुए चुनावी बांड पर रोक लगा दी थी.

क्या है इलेक्टोरल बांड

देश में साल 2018 में इलेक्टोरल बांड स्कीम को कानूनी रूप से लागू किया गया था. सरकार ने इस योजना को लागू करने के पीछे तर्क दिया था कि इससे राजनीतिक दलों को होने वाली फंडिंग में पारदर्शिता आएगी और काले धान पर रोक लगेगी. इलेक्टोरल बांड 1000, 10 हजार, 1 लाख और 1 करोड़ रुपये तक के हो सकते हैं.

देश का कोई नागरिक, कंपनी या संस्था अगर किसी राजनीतिक दल को चंदा देना चाहता है तो उसे इलेक्टोरल बांड खरीदना होगा. स्कीम के तहत बांड खरीदने वाले या पार्टी को चंदा देने वाले शख्स या संस्था का नाम गुप्त रखा गाएगा. इस बांड को आप बैंक को वापस कर सकते हैं और अपना पैसा वापस ले सकते हैं, लेकिन एक तय समय सीमा के अंदर आपको यह सब औपचारिकताएं करनी होंगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस स्कीम को असंवैधानिक और आरटीआई का उल्लंघन करार देते हुए 15 फरवरी को इस पर रोक लगा दी थी.