मुंबई के नए मेयर को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है, लेकिन फैसला तुरंत नहीं होगा. इसका कारण यह है कि मेयर पद का चुनाव एक तय कानूनी प्रक्रिया के तहत होता है, जिसमें आरक्षण अहम भूमिका निभाता है.
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने महायुति को मेयर मिलने का दावा किया है, लेकिन भाजपा और शिवसेना के बीच पद को लेकर खींचतान भी सामने आ रही है.
मुंबई में मेयर का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है, लेकिन इससे पहले आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होना अनिवार्य है. जब तक शहरी विकास विभाग लॉटरी के जरिए यह तय नहीं कर देता कि पद किस वर्ग के लिए आरक्षित होगा, तब तक कोई भी दल अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं कर सकता. इसी वजह से विधानसभा गठन के बाद भी प्रक्रिया में समय लगना तय है.
मेयर पद का आरक्षण पहले से निर्धारित नहीं होता. शहरी विकास विभाग द्वारा आयोजित लॉटरी में यह तय किया जाता है कि पद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग या महिलाओं के लिए आरक्षित होगा. लॉटरी पूरी होने के बाद ही आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया जाता है, जिससे आगे की चुनावी प्रक्रिया शुरू हो पाती है.
लॉटरी प्रणाली का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना है. इससे सरकार और राजनीतिक दलों पर आरक्षण में हेरफेर के आरोप नहीं लगते. साथ ही यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि हर सामाजिक वर्ग को समय-समय पर नेतृत्व का अवसर मिले और किसी एक वर्ग का दबदबा लगातार न बना रहे.
मेयर पद का रोटेशन 74वें संविधान संशोधन से जुड़ा है, जिसने शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया. इसके तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं को नेतृत्व में भागीदारी सुनिश्चित की गई. महाराष्ट्र में नगर निगम अधिनियम के माध्यम से ओबीसी वर्ग को भी इस दायरे में शामिल किया गया है.
आरक्षण की लॉटरी, अधिसूचना जारी होने और फिर पार्षदों द्वारा मतदान की प्रक्रिया पूरी होने में कुछ दिन लग सकते हैं. ऐसे में मतगणना के बावजूद इस सप्ताह मुंबई को नया मेयर मिलने की संभावना कम मानी जा रही है.