नई दिल्ली: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने सोमवार को पार्टी नेतृत्व पर खुला हमला बोलते हुए केरल की वाम सरकार की सराहना की. उनके बयान ने विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल बढ़ा दी है. पार्टी ने हालांकि उनके विचारों से खुद को अलग बताया है.
अय्यर ने कहा कि वे कांग्रेस के सदस्य हैं और खुद को गांधीवादी, नेहरूवादी और राजीववादी मानते हैं, लेकिन राहुलियन नहीं. उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर की जीवनी 'अ पार्ट ऑफ अपार्ट' का हवाला देते हुए इशारों-इशारों में पार्टी के भीतर असहमति की जगह कम होने की बात कही. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वर्तमान नेतृत्व असहमति को संभालने में परिपक्वता नहीं दिखा पा रहा.
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा पर निशाना साधते हुए अय्यर ने उन्हें 'कठपुतली' और 'तोता' तक कह दिया. उनका आरोप था कि खेड़ा केवल वही दोहराते हैं जो पार्टी सांसद जयराम रमेश कहते हैं. अय्यर ने यह भी कहा कि पार्टी में लाखों ऐसे कार्यकर्ता हैं जो बेहतर प्रवक्ता साबित हो सकते हैं, लेकिन नेतृत्व ने गलत चयन किया है.
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल पर भी अय्यर ने तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि पार्टी की मौजूदा हालत उसके नेतृत्व की कार्यशैली को दर्शाती है. अय्यर ने इशारों में यह भी कहा कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की परंपरा पहले अधिक मजबूत थी.
विवाद की शुरुआत उस वक्त हुई जब अय्यर ने केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की खुलकर प्रशंसा की और उम्मीद जताई कि वे दोबारा सत्ता में लौटेंगे. उन्होंने कहा कि केरल में पंचायत राज व्यवस्था को और सुदृढ़ करने की जरूरत है और वाम सरकार इस दिशा में बेहतर काम कर रही है. उन्होंने मुख्यमंत्री से कांग्रेस द्वारा छोड़ी गई जिम्मेदारी की मशाल उठाने का आग्रह भी किया.
अय्यर के बयान से असहज कांग्रेस ने तुरंत दूरी बना ली. पवन खेड़ा ने स्पष्ट किया कि अय्यर का पार्टी से पिछले कुछ वर्षों से कोई औपचारिक संबंध नहीं है और वे निजी हैसियत में बोल रहे हैं. वहीं जयराम रमेश ने दावा किया कि केरल की जनता आगामी चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) को दोबारा सत्ता सौंपेगी और वाम मोर्चा तथा भाजपा पर परोक्ष गठजोड़ का आरोप लगाया.
केरल में चुनावी सरगर्मी के बीच अय्यर के बयान ने कांग्रेस के भीतर चल रही अंतर्कलह को उजागर कर दिया है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ऐसे बयान विपक्षी दलों को कांग्रेस पर हमला करने का मौका देते हैं, खासकर तब जब पार्टी पहले से ही संगठनात्मक चुनौतियों से जूझ रही हो.