नई दिल्ली: असम की सियासत में उस समय भारी हलचल मच गई जब पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि. यह राजनीतिक ड्रामा ज्यादा देर नहीं चला और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की समझाइश के बाद उन्होंने अपना फैसला बदल लिया. इस घटनाक्रम ने न केवल कांग्रेस के भीतर के असंतोष को उजागर किया है. बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की प्रमुख पार्टियों के बीच जुबानी जंग को भी काफी तेज कर दिया है.
भूपेन बोरा ने मल्लिकार्जुन खड़गे को भेजे पत्र में 'अनदेखी' किए जाने का आरोप लगाया था. उनका मानना था कि पार्टी में उन्हें वह सम्मान नहीं मिल रहा जिसके वे हकदार हैं. इस्तीफे की खबर फैलते ही गौरव गोगोई समेत कई दिग्गज नेता उनके घर पहुंचे. लंबी बैठकों और भविष्य में अहम प्रभार मिलने के भरोसे के बाद बोरा ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया. यह यू-टर्न पार्टी की एकता बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण कोशिश मानी जा रही है.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने बोरा को असम कांग्रेस का आखिरी हिंदू नेता बताया, जो जमीनी स्तर से जुड़ा है. सरमा के अनुसार बोरा का इस्तीफा इस बात का सबूत है कि कांग्रेस में सामान्य पृष्ठभूमि के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टिकरण के आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी का ढांचा अब पूरी तरह चरमरा चुका है और इसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है.
बोरा का 2021 से 2025 तक का कार्यकाल संगठन को मजबूत करने वाला रहा है. उनके अचानक बागी तेवरों ने नेतृत्व की नींद उड़ा दी थी. हालांकि विवाद फिलहाल टल गया है. लेकिन पार्टी के अंदर का असंतोष संदिग्ध बना हुआ है. मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि आने वाले समय में 4-5 विधायक भी पार्टी छोड़ सकते हैं. यदि ऐसा होता है. तो विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए अपनी जमीन और साख बचाना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है.
मुख्यमंत्री सरमा ने साफ किया कि बीजेपी फिलहाल किसी को शामिल करने के लिए जल्दबाजी में नहीं है. राज्यसभा चुनाव नजदीक होने के कारण पार्टी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बोरा ने बीजेपी में आने के लिए उनसे कोई संपर्क नहीं किया है. हालांकि. विपक्षी नेताओं का दलबदल एक ऐसा नियम बन गया है जो हर चुनाव से पहले देखने को मिलता है.