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'कुंभ के खर्च का थोड़ा हिस्सा शिक्षा पर लगता तो बच जाते स्कूल', जस्टिस वराले की दो टूक

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने महाराष्ट्र में शिक्षा बजट घटने और मराठी माध्यम स्कूलों के बंद होने पर चिंता जताई. उन्होंने सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने महाराष्ट्र में शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है. धुले में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सरकारी मराठी माध्यम स्कूलों के बंद होने और बड़े आयोजनों पर होने वाले खर्च का जिक्र किया. उनका कहना था कि विकास योजनाओं पर खर्च जरूरी है, लेकिन शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा के लिए बजट बढ़ने के बजाय कई वर्षों में घटा है.

जस्टिस वराले ने नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले और दूसरे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए घोषित रकम का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि सरकार की विकास योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पर उन्हें आपत्ति नहीं है. लेकिन यदि इन बड़ी रकम का बहुत छोटा हिस्सा भी शिक्षा के लिए दिया जाए, तो कई सरकारी स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता है.

100 से 125 मराठी स्कूलों का किया जिक्र

अपने संबोधन में जस्टिस वराले ने कहा कि कुंभ मेले के लिए 32,000 करोड़ और 34,000 करोड़ रुपये जैसी रकम का उल्लेख किया गया है. उन्होंने दावा किया कि करीब 32 करोड़ रुपये शिक्षा पर खर्च किए जाते तो राज्य में लगभग 100 से 125 मराठी माध्यम स्कूल बंद होने से बच सकते थे. उन्होंने शिक्षा संस्थानों की जरूरतों और सरकारी प्राथमिकताओं के बीच संतुलन पर जोर दिया.


क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई को बताया अहम

जस्टिस वराले ने क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा के महत्व पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने धुले के नगरपालिका और जिला परिषद के मराठी माध्यम स्कूलों में 10वीं तक पढ़ाई करने का अपना अनुभव साझा किया. उन्होंने कहा कि मराठी में शिक्षा हासिल करने से उनके करियर में कोई बाधा नहीं आई. उनके मुताबिक, मातृभाषा में पढ़ाई ने उन्हें समाज और लोगों को व्यापक नजरिए से समझने में मदद की.

शिक्षा बजट में कमी पर जताई चिंता

जस्टिस वराले ने शिक्षा के लिए बजट आवंटन में आई कमी पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि छात्रों की संख्या और जरूरतें बढ़ रही हैं, ऐसे में शिक्षा बजट में बढ़ोतरी होनी चाहिए थी. इसके बजाय कई वर्षों में आवंटन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया. उन्होंने ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति सुधारने की जरूरत बताई और कहा कि सरकार को शिक्षा के मूल ढांचे को प्राथमिकता देनी चाहिए.

विकास के साथ शिक्षा पर भी ध्यान जरूरी

जस्टिस वराले ने अपने संबोधन में विकास कार्यों और शिक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता बताई. उनका जोर इस बात पर था कि बड़े प्रोजेक्ट और आयोजन अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन स्कूलों की बुनियादी जरूरतों की कीमत पर नहीं. उन्होंने ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत पर ध्यान दिलाया. उनका संदेश था कि मजबूत शिक्षा व्यवस्था किसी भी समाज के दीर्घकालिक विकास की बुनियाद है.