खबरियों की किल्लत, पीर पंजाल की गुफाएं और घने जंगल, जम्मू में क्यों सैनिकों पर भारी पड़ रहे आतंकी? समझिए पूरी बात
जम्मू और कश्मीर में सुरक्षाबलों को कई स्तर की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा था. सुरक्षाबलों के खबरी फूट रहे हैं, एक वजह यह भी है कि घाटी में आतंकी, सुरक्षाबलों पर भारी पड़ रहे हैं. स्थानीय राजनीति की जद में फंसे लोग, सेना की मदद से कतरा रहे हैं. अगर कश्मीर को आतंक मुक्त करना है तो इनके मदद की जरूरत पड़ेगी.
जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटने के कई साल बाद, घाटी में कुछ नए आतंकी संगठन पैदा हो गए हैं. साल 2019 से ही द रजिस्टेंस फ्रंट (TRF), पीपुल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट (PAFF), जम्मू कश्मीर एंड गनजवी फोर्स (JKGF) और कश्मीर टाइगर्स (KT) जैसे आतंकी संगठन कुकरमुत्ते की तरह उग आए हैं. मार्च में सरकार ने साल 2023 में राज्यसभा में कहा था कि इन्हें अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट के तहत बैन किया गया है. एक तरफ आतंकी संगठनों की भरमार हो गई है लेकिन खुफिया इनपुट की सुरक्षाबलों के पास किल्लत हो गई है.
साल 2021 से लेकर अब तक, घाटी में 47 जवान शहीद हो गए हैं. जम्मू संभाग में 7 से ज्यादा बार एनकाउंटर हुआ है जिसमें आतंकी कई जगह, सुरक्षाबलों पर भारी पड़े. सुरक्षाबलों ने काउंटर अटैक में उन्हें ढेर तो कर दिया कई जवान शहीद हो गए. ऐसा हो क्यों रहा है, आइए समझते हैं.
क्यों जम्मू में सुरक्षाबलों पर भारी पड़ रहे आतंकी?
कश्मीर घाटी में सुरक्षाबलों को जिन 'खबरियों' के जरिए आतंकी गतिविधियों की जानकारी मिलती थी, वे ही या तो दगा दे रहे हैं, या स्थानीय राजनीति की वजह से लोग खबरी बन नहीं रहे हैं. आमने-सामने की मुठभेड़ में, सेना को सटीक जानकारी नहीं मिल पा रही है, जिसकी कीमत, सुरक्षाबलों की जान है.
जम्मू इलाके में सुरक्षाबलों के सामने ज्यादा चुनौतियां हैं. पीर पंजाल की पहाड़ी, आतंकियों के लिए सुरक्षित घर बन गई हैं. वहां की प्राचीन गुफाओं में वे छिपे रहे हैं, सेना के पास उनके लोकेशन की इनपुट की कमी है, जिसकी वजह से ऑपरेशन आल आउट भी बाधित हो रहा है.
गुरिल्ला वार कर रहे हैं ट्रेंड आतंकी
आतंकी, पूरी तरह से ट्रेन होकर आए हैं. वे छापामार लड़ाई में भरोसा कर रहे हैं, सेना सड़क पर होती है, वे पहाड़ी पर. टॉप पोजिशन होने की वजह से भी वे सेना पर भारी पड़ रहे हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो सेना का बड़ी संख्या में घाटी से हटना भी, आतंकियों की संख्या बढ़ने की एक वजह है.
पीर पंजाल को सुधारने में लगेगा वक्त
दक्षिणी पीर पंजाल में बढ़ रहे आतंकवाद को लेकर सेना की बैठकें हई हैं. कैबिनेट सुरक्षा समिति ने भी सुरक्षा के हालात की समीक्षा की है. अधिकारियों का मानना है कि अब अतिरिक्त सैन्य तैनाती और ज्यादा एडवांस तकनीक की जरूरत जम्मू इलाके में पड़ रही है. इस इलाके में हालात स्थिर करने में अब वक्त लगेगा.
क्यों आतंकियों के लिए सेफ है पीर पंजाल?
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अधिकारी मानते हैं कि दक्षिणी पीर पांजाल इलाका ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों की वजह से आतंकियों के लिए सेफ है. यहां आतंकी ठिकाने हैं और बड़ी गुफाएं हैं. ये गुफाएं, ऐसी हैं जहां आराम से छिपा जा सकता है.
हर मौसम में इन गुफाओं में रहा जा सकता है. इस इलाके में 35 से 40 आतंकी सक्रिय हैं. ये बहुत छोटी-छोटी टीमों में टुकड़ियों में काम कर रहे हैं. खुफिया जानकारियों के मुताबिक ज्यादातर ये आतंकी पाकिस्तानी मूल के हैं और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी हैं.
इनक्रिप्टेड मैसेज, आधुनिक हथियार, आतंकियों को बना रहे काल
आतंकियों के पास अत्याधुनिक हथियार हैं. उनकी बातचीत ऐसी है कि जिसमें सेंध नहीं लगाई जा सकती है. जैसे WhatsApp इनक्रिप्शन होता है, कुछ वैसा ही सिस्टम, आतंकियों के पास है. एक साल में 6 से 7 बड़े हमले हो जाते हैं. डोडा में ही सोमवार को 4 जवान शहीद हो गए. एक कैप्टन रैंक का अधिकारी शहीद हो गया. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में तो यह भी दावा किया गया है कि साल 2021 से अब तक, जम्मू और कश्मीर में कुल 125 लोग शहीद हो गए हैं, जिनमें से 52 जम्मू क्षेत्र के हैं.
कश्मीर नहीं, जम्मू है आतंकियों के निशाने पर
अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान ने कश्मीर से फोकस हटाकर, अब जम्मू को अशांत करने की योजना बना ली है. आतंकी, राजौरी, पुंछ और अनंतनाग तक सिमट गए हैं. अब आतंकी, रियासी, डोडा, भादेरवाह, कठुआ और उधमपुर तक चले आए हैं. कश्मीर घाटी में सैनिकों की व्यापक तैनाती है तो वहां ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे पाना मुश्किल हो गया है. अभ सरकार का फोकस जल्द ही जम्मू पर होने वाला है.
क्या है सेना की रणनीति?
सेना ने अपने स्पेशल काउंटर इनसर्जेंसी ट्रूप्स को पूर्वी लद्दाख में मई 2020 में गलवान झड़प के बाद भेज दिया था. ये सैनिक, एंटी टेरर ऑपरेशन में माहिर थे और ऐसी मुठभेड़ों के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित थे. कुछ वर्दीधारी सुरक्षाबल भी भेजे गए, कुछ राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों को शिफ्ट किया गया. यहीं चूक हो गई. इस इलाके में अभी और सख्ती की जरूरत थी.
खबरियों की किल्लत से जूझ रही सेना?
एक और बड़ी चूक ये है कि इस इलाके में, सेना के पास खबरियों का जो मजबूत नेटवर्क है, अभी बन नहीं पाया है. जम्मू क्षेत्र का आतंकवाद, सेना के लिए अपेक्षाकृत नया है. ऐसे में नए खबरियों की भर्ती, उनका भरोसा हासिल करना, अभी बड़ी चुनौती है. जब भी, आमने सामने की मुठभेड़ होती है, तब बिना खबरियों के लिए सेना का निपट पाना, थोड़ा मुश्किल होता है.
कब तक मुश्किलों में रहेगी सैनिकों की जिंदगी?
ऐसा नहीं है कि सेना के पास ही अत्याधुनिक हथियार हैं, आतंकियों के पास भी खतरनाक हथियार हैं. उनके पास चीन का बना हुए मोबाइल फोन 'अल्ट्रा सेट' है. इसका नेटवर्क ऐसा है, जिसे हैक कर पाना, सेना के लिए भी मुश्किलों भरा है. जब तक, खबरी नहीं होंगे, सैनिकों को खतरा उठाना पड़ेगा.
क्या राजनीति के शिकार हो रहे खबरी?
गुज्जर और बकेरवाल समुदाय के लोग स्थानीय राजनीति का शिकार हो रहे हैं. पहले स्थानीय लोग, सेना की मदद करते थे. वे आतंकी गतिविधियों की जानकारी देते थे, जिससे सुरक्षाबल मजबूत स्थिति में रहते थे. पाकिस्तान, इन्हें लालच दे रहा है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है.