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India Daily

भारतीय सेना को मिलने जा रहा है ऐसा 'अदृश्य हथियार', बिना गोली चलाए दुश्मन होगा तबाह

भारत के पास जल्द ही हाई-पावर माइक्रोवेव टेक्नोलॉजी आ जाएगी. भारतीय नौसेना ने रक्षा मंत्रालय के 'ADITI 3.0' प्रोग्राम के तहत भारत की ही 'टोंबो इमेजिंग' कंपनी को स्वदेशी HPM सिस्टम बनाने का कॉन्ट्रैक्ट दिया है.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
भारतीय सेना को मिलने जा रहा है ऐसा 'अदृश्य हथियार', बिना गोली चलाए दुश्मन होगा तबाह
Courtesy: pintrest

नई दिल्ली: भारत जल्द ही दुनिया के उन चुनिंदा देशों की लिस्ट में शामिल होने जा रहा है जिनके पास हाई-पावर माइक्रोवेव हथियार टेक्नोलॉजी है. भारतीय नौसेना ने रक्षा मंत्रालय के 'ADITI 3.0' प्रोग्राम के तहत भारत की ही 'टोंबो इमेजिंग' कंपनी को स्वदेशी HPM सिस्टम बनाने का कॉन्ट्रैक्ट दिया है. इस एडवांस टेक्नोलॉजी के आने से भारत की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की क्षमता काफी मजबूत हो जाएगी.

क्या है यह 'HPM' तकनीक और यह कैसे करती है काम?

हाई-पावर माइक्रोवेव (HPM) एक तरह का 'डायरेक्टेड एनर्जी वेपन' है. आसान शब्दों में कहें तो यह पारंपरिक हथियारों की तरह गोली या मिसाइल नहीं दागता बल्कि बहुत ताकतवर माइक्रोवेव एनर्जी छोड़ता है. यह दुश्मन के रडार, सेंसर, कम्युनिकेशन सिस्टम और ड्रोन्स के इलेक्ट्रॉनिक्स को पल भर में ठप या पूरी तरह बर्बाद कर सकता है. इस तकनीक की मदद से बिना किसी बड़े धमाके या भौतिक नुकसान के दुश्मन के जहाजों, लड़ाकू विमानों या ड्रोन्स को खत्म किया जा सकता है.

ड्रोन हमलों से निपटना हो जाएगा बहुत आसान

इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फायदा आधुनिक दौर के 'स्वार्म ड्रोन' हमलों से निपटने में होगा. स्वार्म ड्रोन यानी कम लागत वाले ड्रोन्स का एक पूरा झुंड, जो एक साथ हमला करता है. हाल ही में हॉरमुज जलडमरूमध्य जैसे समुद्री इलाकों में ऐसे ड्रोन हमले देखे गए हैं जो नौसेनाओं के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं. HPM सिस्टम एक साथ कई ड्रोन्स को हवा में ही जाम कर सकता है.

आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम

इस प्रोजेक्ट का एक अहम हिस्सा इसके जरूरी पार्ट्स को भारत में ही तैयार करना है जो रक्षा के क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' को बढ़ावा देता है. भारतीय नौसेना ने साल 2047 तक एडवांस वॉरफेयर टेक्नोलॉजी में पूरी तरह आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य रखा है और यह प्रोजेक्ट उसी दिशा में एक बड़ा कदम है. फिलहाल अमेरिका, चीन, रूस और कुछ यूरोपीय देशों के पास ही यह खास तकनीक मौजूद है. इस कामयाबी के साथ भारत भी इस एलीट क्लब में शामिल हो जाएगा.