नई दिल्ली: स्वतंत्रता दिवस भारत के इतिहास का सबसे गौरवशाली पर्व है, लेकिन पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं. स्वतंत्रता दिवस और महात्मा गांधी की भूमिका आज भी देश की सामूहिक स्मृति का अहम हिस्सा है. आजादी का जश्न दिल्ली में था, जबकि गांधी सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए बंगाल में उपवास कर रहे थे ताकि बंटवारे से जूझ रहे परिवारों के बीच शांति और भाईचारे का संदेश पहुंचे.
आजादी की कहानी केवल सत्ता हस्तांतरण तक सीमित नहीं थी. इसके पीछे ब्रिटिश शासन के अंतिम फैसले, लॉर्ड माउंटबेटन की रणनीति, विभाजन की त्रासदी और करोड़ों लोगों की कुर्बानी छिपी हुई थी. यही वजह है कि 15 अगस्त का हर उत्सव हमें जश्न के साथ उन अनगिनत लोगों की पीड़ा और संघर्ष भी याद दिलाता है, जिन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना साकार किया.
ब्रिटिश संसद ने मूल योजना के अनुसार भारत को जून 1948 तक सत्ता सौंपने का निर्णय लिया था, लेकिन अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने यह प्रक्रिया कई महीने पहले पूरी कर दी. उनका मानना था कि देरी होने पर दंगे और हिंसा और बढ़ सकती है. इतिहासकारों के अनुसार माउंटबेटन ने 15 अगस्त इसलिए चुना क्योंकि इसी दिन 1945 में जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण किया था. यह तारीख उनके लिए ऐतिहासिक महत्व रखती थी और वही भारत की स्वतंत्रता का दिन बन गई.
यह शायद आजादी का सबसे भावुक तथ्य है. 15 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी दिल्ली में आयोजित किसी भी समारोह में मौजूद नहीं थे. वे बंगाल के नोआखली क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम हिंसा रोकने के लिए लोगों के बीच रह रहे थे. गांधी ने उस दिन उत्सव नहीं मनाया, बल्कि 24 घंटे का उपवास रखा. उनके लिए आजादी का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि समाज में शांति और भाईचारा स्थापित करना था.
14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया, जिसे पूरी दुनिया ने सुना. इस भाषण को बाद में 'नियति से साक्षात्कार”'के नाम से ऐतिहासिक पहचान मिली. दिलचस्प बात यह है कि महात्मा गांधी ने यह भाषण नहीं सुना. वे उस समय जल्दी विश्राम के लिए जा चुके थे और अगले दिन भी सांप्रदायिक तनाव कम कराने के प्रयासों में लगे रहे.
हर वर्ष प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले से तिरंगा फहराते हैं, लेकिन 1947 में ऐसा नहीं हुआ था. ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि स्वतंत्र भारत का पहला औपचारिक ध्वजारोहण लाल किले पर 16 अगस्त को किया गया था. 14 अगस्त की रात संसद भवन और 15 अगस्त की सुबह राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय गुंबद पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया. लाल किले की परंपरा अगले दिन शुरू हुई और बाद में यही राष्ट्रीय परंपरा बन गई.
15 अगस्त केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग, शांति और लोकतंत्र की साझा विरासत का प्रतीक है. यही दिन हमें याद दिलाता है कि आजादी केवल हासिल नहीं की जाती, बल्कि हर पीढ़ी उसे अपने कर्तव्यों और एकता से मजबूत भी बनाती है.