हल्द्वानी हिंसा की जांच की गति पर अफसोस जताते हुए, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बुधवार को आरोपी 50 लोगों को 'डिफॉल्ट जमानत' दे दी. कोर्ट की ओर से कहा गया कि पुलिस की ओर से चार्जशीट 90 दिन की समय सीमा के अंदर दायर नहीं किया गया था. जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की बेंच ने निचली अदालत के पिछले फैसले को भी पलट दिया, जिसमें पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया था. हिंसा 8 फरवरी को हुई थी और सीआरपीसी के अनुसार आरोपपत्र 90 दिनों के भीतर दाखिल किया जाना चाहिए था.
नैनीताल में प्रशासन की ओर से हल्द्वानी में अतिक्रमण के खिलाफ चलाए गए बुलडोजर एक्शन के बाद हिंसा भड़क गई थी. बुलडोजर एक्शन के दौरान प्रशासन ने बनभूलपुरा में एक मस्जिद और एक मदरसा को ध्वस्त कर दिया था. जिला अधिकारियों ने कहा था कि दोनों संरचनाएं नजूल भूमि पर थीं, नजूल भूमि यानी सरकारी भूमि जिसका आधिकारिक तौर पर रेवेन्यू रिकार्ड में उल्लेख नहीं है.
मस्जिद और मदरसे को गिराए जाने के बाद भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया था. मौके पर कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया था. वहीं, स्थानीय पुलिस स्टेशन को भीड़ ने घेर भी लिय़ा था. मामले की जानकारी के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी किए थे. हल्द्वानी हिंसा में पांच लोग मारे गए थे, जबकि पुलिसकर्मियों समेत कई अन्य घायल हुए थे.
पुलिस ने पांच महिलाओं समेत 90 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया था. जुलाई में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड अब्दुल मलिक की पत्नी सफ़िया मलिक को ज़मानत दे दी थी. अपने आदेश में हाई कोर्ट ने उल्लेख किया कि मामले के रिकार्ड का अवलोकन करने पर यह पाया गया कि अपीलकर्ता 13 फरवरी से न्यायिक हिरासत में हैं तथा उनकी 90 दिन की अवधि समाप्त हो चुकी है.
हाई कोर्ट ने ये भी कहा कि उन्होंने “जांच में तत्परता नहीं देखी, बल्कि जांच सुस्त थी और ऐसी सुस्त जांच के लिए अपीलकर्ताओं को कष्ट नहीं दिया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से जांच आगे बढ़ी, उससे जांच अधिकारी की लापरवाही का पता चलता है कि जांच कितनी धीमी गति से आगे बढ़ी, वह भी ऐसी स्थिति में जब अपीलकर्ता न्यायिक हिरासत में थे. तीन महीने के समय में, केवल 8 सरकारी गवाहों और 4 सार्वजनिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए. सुस्त जांच की पराकाष्ठा ये है कि पहले महीने में केवल 2 सरकारी गवाहों और 1 आधिकारिक गवाह से पूछताछ की गई.
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए, हाई कोर्ट के वकील अहरार बेग (हिंसा के लिए जिम्मेदार विध्वंस के खिलाफ एक याचिका में एक परिवार का प्रतिनिधित्व किया) ने कहा कि चार्जशीट दाखिल करने में देरी हुई क्योंकि पुलिस ने 90 दिनों से अधिक समय लिया. राज्य सरकार ने कहा कि उन्हें अतिरिक्त समय की आवश्यकता है क्योंकि इसी बीच चुनाव भी आ गए थे. इसके बाद निचली अदालत ने दो बार जांच का समय बढ़ाया. इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
डिफ़ॉल्ट जमानत का मतलब, किसी व्यक्ति को दी जाने वाली ऐसी जमानत से है, जब पुलिस या मामले के जांच अधिकारी अपराधों के बारे में एक निश्चित समय के अंदर रिपोर्ट दर्ज करने में असमर्थ रहते हैं. डिफॉल्ट जमानत को इसे वैधानिक जमानत भी कहा जाता है.