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India Daily

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट जिसका हो रहा है विरोध? 92 हजार करोड़ होंगे खर्च, देश के लिए क्यों है अहम

92 हजार करोड़ की लागत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से बहुत अहम है. पर्यावरण समूह और राजनेता इसका विरोध कर रहे हैं.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट जिसका हो रहा है विरोध? 92 हजार करोड़ होंगे खर्च, देश के लिए क्यों है अहम
Courtesy: grok

नई दिल्ली: भारत की सबसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर पहलों में से ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का विरोध शुरू हो गया है. 72 हजार करोड़ से 92 हजार करोड़ के बीच की लागत से बनने वाले इस प्रोजेक्ट को ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकसित किया जा रहा है जो अंडमान और निकोबार द्वीपों का सबसे दक्षिणी हिस्सा है. इस प्रोजेक्ट में एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक पावर प्लांट शामिल है.

अलग-अलग चरणों में पूरा होगा प्रोजेक्ट

इस प्रोजेक्ट को अलग-अलग चरणों में प्लान किया गया है. विकास का पहला चरण 2025 और 2035 के बीच रखा है. इसका एक मुख्य आकर्षण गैलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित पोर्ट है जो शुरू में 4.4 मिलियन TEU (कंटेनर) को संभालेगा और बाद में इसका विस्तार करके 16 मिलियन TEU तक पहुंचाया जाएगा. यह पोर्ट इतना गहरा होगा कि इसमें बड़े कार्गो जहाज आसानी से आ सकें. इसके अलावा, एक 'डुअल-यूज' तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाया जाएगा, जो नागरिक और रक्षा, दोनों तरह के ऑपरेशन्स में मदद करेगा. ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए गैस और सौर ऊर्जा पर आधारित 450 MVA का एक पावर प्लांट भी प्लान किया गया है, साथ ही एक आधुनिक टाउनशिप भी बनाई जाएगी जिसमें रहने और व्यापार करने की सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी.

प्रोजेक्ट का मकसद क्या है?

इस प्रोजेक्ट का मकसद हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है. यह प्रोजेक्ट मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है- जो दुनिया का एक प्रमुख शिपिंग मार्ग है और जहां से दुनिया का लगभग 30% व्यापार होता है. इस प्रोजेक्ट से भारत की सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम हो सकती है. इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और काफी राजस्व भी मिलेगा. इसके अलावा, इस प्रोजेक्ट से 40,000 से 50,000 नई नौकरियां पैदा होने और पर्यटन व लॉजिस्टिक्स क्षमताओं में भी सुधार होने की उम्मीद है.

प्रोजेक्ट को लेकर क्यों हो रहा है विरोध?

वहीं दूसरी तरफ इस प्रोजेक्ट को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है. राजनेता और पर्यावरण समूह शामिल प्रोजेक्ट को लेकर तर्क दे रहे हैं कि इस प्रोजेक्ट की वजह से बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हो सकती है, जिससे लगभग 160 वर्ग किलोमीटर वन भूमि प्रभावित होगी और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचेगा. इसके अलावा, शोम्पेन और निकोबारी जैसी स्वदेशी जनजातियों पर पड़ने वाले इसके असर को लेकर भी चिंताएं जताई गई हैं.

सरकार ने दावों को किया खारिज

वहीं सरकार ने इन दावों को खारिज कर दिया है. सरकार का कहना है कि कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82% हिस्सा ही इस प्रोजेक्ट से प्रभावित होगा. लगभग 18 लाख 65 हजार पेड़ों में से, लगभग 7 लाख 11 हजार पेड़ों को अलग-अलग चरणों में काटा जा सकता है. अधिकारी इस बात पर भी जोर देते हैं कि पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियां वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसे संस्थानों द्वारा की गई विस्तृत स्टडीज के बाद ही दी गई हैं. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है.

पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए कोरल को दूसरी जगह ले जाना, वन्यजीव प्रबंधन योजनाएं और लगातार निगरानी रखने वाले सिस्टम जैसे उपाय सुझाए गए हैं. हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मुआवजे के तौर पर पेड़ लगाए जाएंगे. आदिवासी समुदायों के संबंध में सरकार ने भरोसा दिलाया है कि किसी का भी विस्थापन नहीं होगा. मूल निवासी समूहों की सुरक्षा करने वाली मौजूदा नीतियों का सख्ती से पालन किया जाएगा और आदिवासी आरक्षित क्षेत्रों के बढ़ने की उम्मीद है.

क्यों जरूरी है ये ड्रीम प्रोजेक्ट?

कुल मिलाकर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की रणनीतिक मौजूदगी और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है. हालांकि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसे लगातार बारीकी से परखा जा रहा है. इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विकास की जरूरतों और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाता है और इसके पूरे होने तक किस तरह पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है.