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जब जनता के दबाव के आगे पार्टी को देना पड़ा था टिकट: 102 साल के वी.एस. अच्युतानंदन के राजनीतिक सफर की शानदार कहानी

उन्होंने 1967, 1970, 1991, 2001, 2006 और 2016 में केरल विधानसभा में जीत हासिल की और 2006 में मलम्पुझा से 20,017 वोटों से जीतकर वे केरल के मुख्यमंत्री बने.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
जब जनता के दबाव के आगे पार्टी को देना पड़ा था टिकट: 102 साल के वी.एस. अच्युतानंदन के राजनीतिक सफर की शानदार कहानी

केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वेलिक्काकथु संकरन अच्युतानंदन का सोमवार शाम निधन हो गया. उनका तिरुवनंतपुरम के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था. 2016 से 2021 तक वे प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष रहे. केरल इस दिग्गज नेता के निधन पर शोक में डूबा है. आइए, डालते हैं उनके जीवन और विरासत पर एक नजर.

किसानों के हक की आवाज

20 अक्टूबर, 1923 को अलप्पुझा के पुन्नप्रा में जन्मे अच्युतानंदन ने कुट्टनाड में कृषि मजदूरों को संगठित कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. 1940 में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और 1964 में 32 नेताओं के साथ मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की स्थापना की. 1990 में किसान कल्याण बोर्ड की शुरुआत के दौरान उन्होंने 'अंशदायम' को मात्र 2 रुपये मासिक रखने की वकालत की, जो उनकी किसानों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

नेतृत्व की ऊंचाइयां

1980 से 1992 तक वे केरल सीपीएम के राज्य सचिव रहे और 1985 में पोलित ब्यूरो में शामिल हुए. उन्होंने 1967, 1970, 1991, 2001, 2006 और 2016 में केरल विधानसभा में जीत हासिल की. 1992-1996, 2001-2006 और 2011-2016 तक वे विपक्ष के नेता रहे. 2006 में मलम्पुझा से 20,017 वोटों से जीतकर वे केरल के मुख्यमंत्री बने.

जनता की आवाज

2001-2006 तक विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने यौन शोषण, भ्रष्टाचार और पर्यावरण क्षरण के खिलाफ मुखर अभियान चलाए. 2011 में पार्टी द्वारा टिकट न दिए जाने पर जनता के विरोध और सोशल मीडिया के दबाव ने उन्हें टिकट दिलाया, और वे 25,000 वोटों से जीते. 2016 में 92 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने मलम्पुझा से 27,142 वोटों से जीत हासिल की.

नैतिकता की मिसाल

अच्युतानंदन का नैतिक दृढ़ता से भरा व्यक्तित्व उन्हें पार्टी के भीतर अलग बनाता था. आरएमपी नेता टी.पी. चंद्रशेखरन की हत्या के बाद उनकी विधवा के.के. रेमा से मुलाकात और 2015 में सीपीएम सम्मेलन से बाहर निकलना उनके साहस को दर्शाता है.

अमिट विरासत

मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने मुनार में अतिक्रमण विरोधी अभियान, लॉटरी माफिया पर कार्रवाई और कोच्चि में विध्वंस अभियान जैसे कदम उठाए. उनके निधन ने केरल की राजनीति में एक युग का अंत कर दिया, लेकिन उनकी विरासत प्रेरणा देती रहेगी.