नई दिल्ली: रूस से तेल आयात को लेकर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बहस के बीच भारत को फ़िनलैंड से अहम समर्थन मिला है. फ़िनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्टोनन ने कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदते समय पश्चिमी देशों द्वारा तय की गई मूल्य सीमा का उल्लंघन नहीं किया. फ़िनलैंड में आयोजित कुल्तारंता टॉक्स के दौरान यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की ऊर्जा नीति का बचाव करते हुए कहा कि तेल खरीद का फैसला राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और व्यावहारिक जरूरतों के आधार पर किया जाता है.
कुल्तारंता टॉक्स में बोलते हुए एलिना वाल्टोनन ने कहा कि पश्चिमी देशों की ओर से लागू की गई प्राइस कैप व्यवस्था का उद्देश्य रूस से तेल खरीद को पूरी तरह रोकना नहीं था. उन्होंने कहा कि भारत ने उसी ढांचे के भीतर रहकर तेल खरीदा है. उनके मुताबिक इस नीति का मकसद वैश्विक तेल आपूर्ति को बनाए रखना था ताकि बाजार में अस्थिरता न आए.
फ़िनिश विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि मूल्य सीमा तय करने का लक्ष्य रूस की आय को सीमित करना था, न कि दुनिया को रूसी तेल से दूर करना. उन्होंने कहा कि यदि तेल की आपूर्ति बाधित होती तो वैश्विक बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता था. इसलिए पश्चिमी देशों ने ऐसी व्यवस्था बनाई जिससे आपूर्ति जारी रहे और रूस को अत्यधिक आर्थिक लाभ भी न मिले.
पैनल चर्चा के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत तेल की खरीद कीमत और उपलब्धता को ध्यान में रखकर करता है. उन्होंने कहा कि 2022 में रूस पर प्रतिबंध लगने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव आए. ऐसे हालात में भारत को अपने ऊर्जा हितों को सुरक्षित रखने के लिए उपलब्ध विकल्पों की ओर बढ़ना पड़ा.
जयशंकर ने कहा कि उस दौर में वैश्विक बाजार में बड़ी मात्रा में उपलब्ध तेल रूस से ही आ रहा था. उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका ने भारत को तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए रूस से तेल खरीदने का सुझाव दिया था. उन्होंने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे को केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता.
भारत की विदेश नीति पर यूरोपीय आलोचना का जवाब देते हुए जयशंकर ने कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि कुछ यूरोपीय देश ऐसे हथियार बेचते रहे हैं जिनका इस्तेमाल वर्षों से भारत के खिलाफ किया जाता रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने कभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे यूरोप की सुरक्षा को खतरा पहुंचा हो. उनके बयान को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के पक्ष में एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है.