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100 साल पुराना दिल्ली का वो क्लब जहां आज भी मेंबरशिप के लिए लगती है दशकों लंबी लाइन… अब सरकार क्यों खाली करवाना चाहती है?

भारत के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक क्लबों में से राजधानी दिल्ली का मशहूर जिमखाना क्लब इस समय एक बहुत बड़े विवाद में आ गया है. दरअसल केंद्र सरकार ने क्लब को 5 जून तक अपनी जमीन और परिसर खाली करने का आदेश दिया है. क्ल्ब मैनेजमेंट ने इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.

delhigymkhana official website
Kuldeep Sharma

दिल्ली का मशहूर जिमखाना क्लब जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक क्लबों में से एक है इस समय एक बहुत बड़े विवाद के केंद्र में आ गया है. केंद्र सरकार ने क्लब को 5 जून तक अपनी जमीन और परिसर खाली करने का आदेश दिया है. सरकार का कहना है कि इस संपत्ति की जरूरत देश की रक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और सार्वजनिक सुरक्षा के कामों के लिए है. इस सरकारी आदेश ने एक नई और बड़ी बहस को हवा दे दी है क्योंकि यह क्लब सिर्फ मौज-मस्ती या सामाजिक मेलजोल की जगह नहीं है बल्कि भारत के औपनिवेशिक और राजनीतिक इतिहास का एक बहुत अहम हिस्सा रहा है.

कहां है यह क्लब और क्या है पूरा मामला?

दिल्ली जिमखाना क्लब लुटियंस दिल्ली के सफदरजंग रोड पर स्थित है जो देश के प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास यानी लोक कल्याण मार्ग के बहुत करीब है. सरकार के अनुसार यह क्लब राष्ट्रीय राजधानी के एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके में लगभग 27.3 एकड़ की विशाल जमीन पर फैला हुआ है. क्लब के मैनेजमेंट ने अपने सदस्यों को जानकारी दी है कि आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि और विकास कार्यालय ने 22 मई को एक आधिकारिक नोटिस भेजा है. इस नोटिस में साफ तौर पर कहा गया है कि सरकार सार्वजनिक सुरक्षा और रक्षा संबंधी जरूरतों के लिए इस जमीन को तुरंत वापस लेना चाहती है.

सरकार का कहना है कि यह जमीन मूल रूप से ब्रिटिश शासन के दौरान इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब लिमिटेड को खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों के लिए पट्टे यानी लीज पर दी गई थी. अब उस लीज एग्रीमेंट में दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए भारत के राष्ट्रपति ने इस लीज को रद्द करने और संपत्ति को सरकार को वापस सौंपने का आदेश जारी किया है. हालांकि जिमखाना क्लब ने सरकार के इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है. क्लब की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से इस मामले पर तुरंत सुनवाई करने का अनुरोध किया जिसके बाद कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए 26 मई की तारीख तय की है.

क्या है जिमखाना क्लब का इतिहास?

दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास इतना पुराना है कि यह खुद नई दिल्ली शहर के बसने की कहानी से जुड़ा हुआ है. साल 1911 में जब ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी को कलकत्ता  यानी आज को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने का एलान किया तो उसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने नई दिल्ली को सत्ता के नए केंद्र के रूप में विकसित करना शुरू किया. इस नई राजधानी में सिर्फ सरकारी दफ्तर और बड़े अफसरों के बंगले ही नहीं बनाए जा रहे थे बल्कि अंग्रेजों को अपने वरिष्ठ अधिकारियों और सैन्य अफसरों के लिए आलीशान और खास सोशल क्लबों की भी जरूरत थी.

इसी जरूरत को पूरा करने के लिए साल 1913 में इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना की गई थी. यह क्लब मुख्य रूप से ब्रिटिश सेना के अधिकारियों, सिविल सेवकों और नई राजधानी में काम करने वाले रईस एवं विशिष्ट प्रशासकों के लिए बनाया गया था ताकि वे वहां आकर अपना खाली वक्त बिता सकें और आपस में मेलजोल बढ़ा सकें. इस क्लब को स्थापित करने में भारत के कई शाही परिवारों ने भी बढ़-चढ़कर मदद की थी. जयपुर, ग्वालियर, जोधपुर, कश्मीर, उदयपुर और किशनगढ़ के महाराजाओं के साथ-साथ भोपाल के नवाब इसके महत्वपूर्ण संस्थापकों और आजीवन सदस्यों में शामिल थे. इन रियासतों के राजाओं ने क्लब को शुरू करने में वित्तीय और सामाजिक रूप से बड़ा योगदान दिया था.

क्लब का आर्केटेक्चर और मशहूर 'लेडी विलिंगडन' पूल

जिमखाना क्लब की जो मौजूदा इमारत हम आज देखते हैं उसे 1930 के दशक की शुरुआत में मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट रसेल ने डिजाइन किया था. रॉबर्ट रसेल दिल्ली में कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति भवन के कुछ हिस्सों को डिजाइन करने के लिए भी जाने जाते हैं. रसेल चाहते थे कि क्लब की इमारत लुटियंस दिल्ली की शानदार और भव्य वास्तुकला से पूरी तरह मेल खाए जो अपनी चौड़ी सड़कों, बड़े-बड़े बंगलों और औपनिवेशिक शैली के ढांचों के लिए दुनिया भर में मशहूर है.

क्लब के भीतर बने स्विमिंग पूल का भी अपना एक दिलचस्प इतिहास है. शुरुआती सालों में क्लब के अंदर कोई स्विमिंग पूल नहीं हुआ करता था. उस समय के वायसराय लॉर्ड विलिंगडन की पत्नी लेडी विलिंगडन को तैरने का बहुत शौक था. उन्होंने क्लब में स्विमिंग पूल और स्क्वैश कोर्ट बनवाने के लिए अपने पास से करीब 21,000 रुपये का दान दिया था. बाद में उनके इस योगदान को सम्मान देने के लिए इन सुविधाओं का नाम 'विलिंगडन' के नाम पर ही रख दिया गया.

सत्ता का प्रतीक, भेदभाव की कहानियां और विभाजन का दर्द

ब्रिटिश शासन के दौरान जिमखाना क्लब को ताकत प्रतिष्ठा और रईसी का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था. विशेष रूप से इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारियों के लिए इस क्लब की सदस्यता मिलना बहुत बड़े सम्मान की बात होती थी. क्लब के अंदर ब्रिटिश तौर-तरीकों, नियमों और संस्कृति का कड़ाई से पालन किया जाता था. बॉलरूम डांसिंग, संडे ब्रंच, इंग्लिश ब्रेकफास्ट की परंपराएं और टेनिस खेलते हुए रसूखदार लोगों से नेटवर्क बनाना यहां की खास लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका था.

लेकिन इस चकाचौंध के पीछे क्लब का एक काला इतिहास भी था जो भेदभाव और नस्लीय असमानता से भरा था. उस जमाने में जब भारतीय मूल के बड़े अफसरों को क्लब के अंदर आने की इजाजत मिल भी जाती थी तब भी उनके साथ ब्रिटिश अफसरों जैसा बर्ताव नहीं होता था. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कई बार भारतीय अधिकारियों को मुख्य इमारत के अंदर जाने की अनुमति नहीं होती थी और उन्हें बाहर लॉन में बैठने के लिए कहा जाता था जबकि ब्रिटिश अधिकारी अंदर बैठकर आनंद लेते थे.

साल 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तब यह क्लब कई भावुक कर देने वाले पलों का गवाह भी बना. कहा जाता है कि भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के कई अधिकारी जो कल तक दोस्त थे और एक साथ काम करते थे उन्होंने दोनों देशों के आधिकारिक रूप से अलग होने से ठीक पहले अपनी आखिरी शामें इसी क्लब में एक-दूसरे के साथ बिताई थीं.

अंग्रेजों के तौर-तरीकों में घुला भारतीय रंग

जब भारत आजाद हुआ तो देश के बदलते मिजाज के साथ क्लब में भी बड़े बदलाव आए. सबसे पहले तो क्लब के नाम से इम्पीरियल शब्द को हमेशा के लिए हटा दिया गया. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस क्लब के उप-संरक्षक बने. धीरे-धीरे क्लब के माहौल में ब्रिटिश परंपराओं के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और खाने-पीने का रंग भी घुलने लगा. समय के साथ क्लब में पश्चिमी खानपान के अलावा बेहतरीन भारतीय चाइनीज और थाई रेस्तरां भी खोले गए.

जिमखाना क्लब अपने लाजवाब खाने के लिए देश भर में मशहूर हो गया. यहां मिलने वाले बटर चिकन, बिरयानी, रोगन जोश, पेस्ट्री, केक, फ्रूट केक, बेक्ड बीन्स और दाल मखनी का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया. आज भी कई लोगों का मानना है कि इस क्लब के खाने की क्वालिटी भारत के बड़े से बड़े फाइव स्टार होटलों को टक्कर देती है. क्लब की सदस्यता का रूतबा आज भी वैसा ही बना हुआ है. जिमखाना क्लब की मेंबरशिप मिलना दुनिया के सबसे मुश्किल कामों में से एक माना जाता है. हालत यह है कि लोग सदस्यता पाने के लिए दशकों तक वेटिंग लिस्ट में पड़े रहते हैं. बताया जाता है कि 1970 के दशक में किए गए कुछ आवेदन आज भी पेंडिंग हैं जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां एंट्री पाना कितना कठिन है.

सरकार का तर्क बनाम क्लब का स्टैंड

अब केंद्र सरकार के अचानक आए इस खाली करने के आदेश ने क्लब के सदस्यों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है. सरकार का साफ कहना है कि क्लब जिस जगह पर स्थित है वह सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील जोन है. इसलिए प्रशासनिक परियोजनाओं, रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और आम जनता की सुरक्षा के लिए इस जमीन को वापस लेना बेहद जरूरी हो गया है. सरकार के पास कानूनी रूप से यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित में इस शाश्वत पट्टे को समाप्त कर जमीन वापस ले सके.

दूसरी तरफ क्लब का मैनेजमेंट इस फैसले का पुरजोर विरोध कर रहा है. क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य मेजर अतुल देव का दावा है कि यह जमीन मूल रूप से क्लब द्वारा खरीदी गई थी लेकिन बाद में सरकार ने उन्हें पूरा मालिकाना हक देने के बजाय केवल एक पट्टा दे दिया. उनका कहना है कि क्लब हमेशा से सरकार को लीज के सारे चार्ज नियमित रूप से चुकाता आया है इसलिए वे इस कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट से कानूनी सुरक्षा की मांग करेंगे.

क्लब ने केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है. क्लब प्रशासन जानना चाहता है कि क्या उन्हें किसी दूसरी जगह शिफ्ट किया जाएगा और अगर यह परिसर खाली करना ही पड़ता है तो क्या सरकार उन्हें इसके बदले कोई वैकल्पिक जमीन देगी? मैनेजमेंट ने यह भी चेतावनी दी है कि इस तरह अचानक की गई कार्रवाई से क्लब के लगभग 14,000 सदस्य 500 से ज्यादा कर्मचारी और उनसे जुड़े तमाम लोगों के जीवन और हितों पर सीधा असर पड़ेगा.

अब आगे क्या होगा?

सरकारी आदेश के मुताबिक अगर यह टेकओवर होता है तो पूरी 27.3 एकड़ की संपत्ति जिसमें सभी ऐतिहासिक इमारतें, हरे-भरे लॉन, खेल के मैदान और अन्य सुविधाएं शामिल हैं भूमि और विकास कार्यालय के माध्यम से सीधे भारत के राष्ट्रपति के नियंत्रण में आ जाएंगी. क्लब को हर हाल में 5 जून 2026 तक शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा सौंपने को कहा गया है. ऐसा न करने पर सरकार कानून के तहत सख्त कदम उठा सकती है.

इस बीच वित्तीय मोर्चे पर क्लब ने बताया है कि पिछले कुछ वर्षों में उसकी आर्थिक स्थिति काफी सुधरी है. जहां साल 2021-22 में क्लब को 12 करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ था वहीं साल 2023-24 में उसे लगभग 9.25 करोड़ रुपये का अनुमानित मुनाफा हुआ है.

इतिहासकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ जमीन के एक टुकड़े का नहीं है बल्कि दिल्ली की विरासत और पहचान से जुड़ा है. पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद ने इसे दिल्ली की एक बेहद महत्वपूर्ण धरोहर संस्था बताया है. वहीं शहरी मामलों की विशेषज्ञ वंदिनी मेहता ने इस स्थिति को थोड़ा अजीब और विडंबनापूर्ण कहा है.

उनका मानना है कि यह देखना काफी दिलचस्प है कि आज का आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत उसी औपनिवेशिक काल की लीज प्रणाली का इस्तेमाल कर रहा है जिसे अंग्रेज कभी जमीनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस्तेमाल करते थे. अब सभी की नजरें दिल्ली हाई कोर्ट पर टिकी हैं कि इस ऐतिहासिक क्लब का भविष्य क्या मोड़ लेता है.