संविधान में आरक्षण की सीमा को लेकर क्या प्रावधान है? आरक्षण में सुधार को लेकर उठ रही मांग के बीच समझें पूरा गणित
पूरे देश में इस वक्त आरक्षण की प्रक्रिया में सुधार की मांग तेज हो रही है. ऐसे में हमें यह समझना जरूरी है कि संविधान में आरक्षण को लेकर क्या प्रावधान हैं.
भारत में आरक्षण की सीमा को लेकर अक्सर यह कहा जाता है कि संविधान ने 50% की सीमा तय कर रखी है, लेकिन कानूनी स्थिति थोड़ी अलग और ज्यादा महत्वपूर्ण है. 50% की सीमा संविधान में सीधे लिखी हुई नहीं है; हालांकि, न्यायपालिका द्वारा निर्धारित नियमों और बाद में किए गए संवैधानिक संशोधनों के तहत आरक्षण की व्यवस्था इस प्रकार काम करती है:
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50% की सीमा
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इंद्रा साहनी मामला (1992): 'मंडल केस' के नाम से मशहूर इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SC, ST और OBC) के लिए कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए.
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सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 और 16) और अवसर की समानता बनी रहे.
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इसमें अपवाद के रूप में यह छूट दी गई थी कि विशेष या सुदूरवर्ती परिस्थितियों (जैसे अति-दुर्गम क्षेत्रों) में यह सीमा पार की जा सकती है.
2. 103वां संविधान संशोधन (EWS आरक्षण)
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2019 में केंद्र सरकार ने 103वां संविधान संशोधन करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान जोड़ा.
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सुप्रीम कोर्ट ने (जनहित अभियान केस, 2022) इस संशोधन को संवैधानिक माना और स्पष्ट किया कि EWS आरक्षण SC/ST/OBC के 50% कोटे से अलग है.
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इसके बाद भारत में कुल केंद्रीय आरक्षण सीमा बढ़कर 60% (50% जातिगत + 10% EWS) हो गई है.
3. राज्यों की स्थिति (अपवाद)
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कई राज्यों ने विशेष परिस्थितियों का हवाला देकर अपने यहां 50% की सीमा से अधिक आरक्षण दिया है.
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उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में कुल 69% आरक्षण लागू है, जिसे संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करके कानूनी सुरक्षा दी गई है.
संविधान में यह कहा गया है कि आरक्षण "उचित सीमा" में होना चाहिए, जिसे न्यायपालिका ने 50% का सामान्य नियम माना है (जिसमें EWS के 10% को छोड़कर बाकी पर यह सीमा लागू होती है).
4. EWS का 10% आरक्षण कैसे आया?
यहीं से मौजूदा बहस और दिलचस्प हो जाती है.
2019 में संसद ने 103वां संविधान संशोधन करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों यानी EWS के लिए अधिकतम 10% आरक्षण का प्रावधान किया.
इससे SC 15% + ST 7.5% + OBC 27% + EWS 10% = 59.5% हो गया.
सवाल उठा कि जब सुप्रीम कोर्ट का 50% सिद्धांत मौजूद है तो 59.5% कैसे?
2022 में Janhit Abhiyan v. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 103वें संशोधन को 3:2 के बहुमत से बरकरार रखा. अदालत के सामने यही सवाल था कि EWS के 10% आरक्षण से कुल आरक्षण 50% से ऊपर जाने का क्या प्रभाव होगा.
इसलिए आज की स्थिति में 50% को एक महत्वपूर्ण न्यायिक सीमा माना जाता है, लेकिन EWS के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 103वें संशोधन को वैध माना है.
5. राज्यों में स्थिति और भी अलग है
केंद्र की व्यवस्था और राज्यों की व्यवस्था को एक जैसा नहीं समझना चाहिए.
कुछ राज्यों में आरक्षण 50% से काफी अधिक है. इसका कारण राज्य-विशिष्ट कानून, सामाजिक संरचना और कुछ मामलों में विशेष संवैधानिक/कानूनी व्यवस्थाएं हैं.
सबसे चर्चित उदाहरणों में तमिलनाडु का 69% आरक्षण है.
वहीं महाराष्ट्र के मराठा आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 50% से ऊपर जाने के लिए बताई गई परिस्थितियों को पर्याप्त नहीं माना और 2021 में संबंधित आरक्षण को रद्द कर दिया.
6. असल बहस सिर्फ "50% या 60%" की नहीं है
आज आरक्षण सुधार की बहस में कम से कम चार अलग सवाल हैं:
पहला - क्या आरक्षण का लाभ सभी पात्र समूहों तक समान रूप से पहुंच रहा है?
यही वजह है कि SC और OBC के भीतर sub-categorisation की मांग उठती है.
उदाहरण के लिए OBC में कुछ जातियों को आरक्षण का लाभ बार-बार मिलने और अत्यंत पिछड़े समूहों को अपेक्षाकृत कम लाभ मिलने की शिकायत लंबे समय से रही है.
दूसरा - क्या आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए?
यह बहस इस बात पर है कि क्या किसी समूह को आरक्षण का लाभ मिलने के बाद उसकी सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति में वास्तविक सुधार हुआ या नहीं.
तीसरा - क्या आर्थिक आधार को ज्यादा महत्व मिलना चाहिए?
EWS आरक्षण ने इस बहस को संवैधानिक स्तर पर नया आयाम दिया है.
चौथा - क्या कुल आरक्षण की सीमा बढ़नी चाहिए?
यह सबसे कठिन राजनीतिक और संवैधानिक प्रश्न है. क्योंकि 50% की सीमा बढ़ाने का मतलब केवल प्रतिशत बढ़ाना नहीं है; इससे मेरिट सीटों/अनारक्षित सीटों का अनुपात, विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व और संविधान के समानता संबंधी सिद्धांत भी प्रभावित होते हैं.
एक लाइन में पूरी स्थिति समझें
संविधान में 50% की कोई सीधी लिखी हुई आरक्षण सीमा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी के बाद सामान्यतः 50% की ceiling का सिद्धांत विकसित किया, असाधारण परिस्थितियों में अपवाद की गुंजाइश रखी; लेकिन 103वें संविधान संशोधन के बाद EWS को 10% आरक्षण मिला और 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा, जिसके कारण केंद्रीय स्तर पर कुल आरक्षण 59.5% तक पहुंचता है.