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लड़कर मेनका गांधी से नहीं जीते, अब बिना लड़े हराएंगे? आखिर कौन हैं सपा में शामिल हुए सोनू सिंह

Sultanpur Lok Sabha Seat: लोकसभा चुनाव में मेनका गांधी की सीट अब फंसती नजर आ रही है. चुनाव से ठीक पहले पूर्व लोकसभा प्रत्याशी सोनू सिंह सपा में शामिल हो गए हैं.

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लड़कर मेनका गांधी से नहीं जीते, अब बिना लड़े हराएंगे? आखिर कौन हैं सपा में शामिल हुए सोनू सिंह
Courtesy: Social Media

उत्तर प्रदेश की सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर अचानक खलबली मच गई है. सुल्तानपुर के बाहुबली नेता कहे जाने वाले पूर्व विधायक और सुल्तानपुर लोकसभा सीट के पूर्व प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू सिंह ने लगभग 22 साल बाद फिर से समाजवादी पार्टी (SP) का दामन थाम लिया है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव संग सोशल मीडिया पर वायरल हुई उनकी तस्वीरों को देखकर सुल्तानपुर का सियासी पारा थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. चर्चाएं हैं कि 2019 में मेनका गांधी से चुनाव हारने वाले सोनू सिंह इस बार चुनाव लड़े बिना ही मेनका गांधी को हराने की दिशा में काम करेंगे.

सोनू सिंह साल 2019 में सुल्तानपुर लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बैनर तले बीजेपी प्रत्याशी मेनका गांधी के खिलाफ चुनाव भी लड़े थे. सोनू ने मेनका गांधी को कड़ी टक्कर दी थी लेकिन उन्हें महज 14 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा था. दरअसल, 25 मई को सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर मतदान होना है. इसी बीच सोनू सिंह के सपा के साथ जाने के बाद माना जा रहा है कि इससे सपा प्रत्याशी रामभुवाल निषाद को काफी मदद मिलेगी.

सुल्तानपुर में कर देंगे खेल?

मेनका गांधी के प्रति नाराजगी, बीजेपी के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी और वरुण गांधी की कम सक्रियता यहां भारी पड़ती दिख रही है. इस बार अखिलेश यादव ने बेहद चतुराई से जातीय समीकरण साधते हुए टिकट बांटे हैं और 'यादवों की पार्टी' कही जाने वाली सपा को अन्य जातियों का हितैषी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. चुनाव में बसपा के उतना सक्रिय होने से से यूपी की ज्यादातर सीटों पर आमने-सामने की लड़ाई है.

ऐसे में सोनू सिंह का चुनाव से ठीक पहले सपा में शामिल होना मेनका गांधी के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है. 2022 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो यहां की पांच में से 4 सीट पर बीजेपी ही जीती थी लेकिन तब समीकरण अलग थे. मौजूदा समय में सुल्तानपुर में बीजेपी को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. वहीं, सपा जातीय समीकरणों को मजबूती से साधती दिख रही है.

लंबे समय से सक्रिय है भद्र परिवार

सोनू सिंह के खिलाफ दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं. उनके भाई यश भद्र उर्फ मोनू सिंह भी इलाके में काफी सक्रिय हैं. माना जाता है कि इन दोनों भाइयों का इनके इलाके में काफी दबदबा है. शायद यही कारण है कि आजादी के बाद से आज तक धनपतगंज की ब्लॉक प्रमुख पद पर भद्र परिवार का ही राज रहा है. कहा जाता है कि यूपी के सुल्तानपुर में विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का लेकिन इस ताकतवर परिवार का फैक्टर हमेशा काम करता है. इस परिवार का राजनीति में अच्छा-खासा दखल बना रहता है. सोनू सिंह और मोनू सिंह की क्षत्रिय वोटर्स में भी मजबूत पकड़ भी मानी जाती है.

इसौली से बने थे विधायक

सोनू सिंह पहली बार इसौली विधानसभा सीट से साल 2002 में सपा के सिंबल पर चुनाव लड़कर विधायक बने. यह वही सीट थी जिससे पहले ही सोनू सिंह के पिता इंद्र भद्र सिंह दो बार विधायक रह चुके थे. फिर साल 2006 में जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे तो इलाहाबाद के हंडिया इलाके में संत ज्ञानेश्वर की और उनके समर्थकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस हत्या में विधायक सोनू सिंह और उनके ब्लॉक प्रमुख भाई मोनू सिंह का नाम आया था. दोनों आरोपी बनाए गए थे. 

इसके बाद साल 2007 में फिर जब विधानसभा चुनाव हुआ तो मुलायम सिंह ने उन्हें दोबारा टिकट देकर इसौली विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी बना दिया और सोनू ने फिर से इस सीट पर जीत हासिल की और दूसरी बार विधायक बने.

हर पार्टी का देखा मुंह

साल 2007 में जब सरकार बदली तो बसपा की सरकार उत्तर प्रदेश में आई. फिर मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद सोनू सिंह को संत ज्ञानेश्वर हत्याकांड में जेल भेज दिया गया. फिर साल 2009 में सोनू सिंह ने सपा से इस्तीफा देकर बसपा ज्वाइन कर लिया. इसके बाद मायावती ने इन्हें इसौली विधानसभा सीट से टिकट देकर चुनाव लड़ाया. सोनू सिंह उस वक्त जेल में बंद थे और जेल में बंद रहते हुए वे तीसरी बार चुनाव जीतकर विधायक बने. साल 2012 में जब परिसीमन बदला तो इसौली विधानसभा सीट पर अपना दबदबा कायम रखने वाले सोनू सिंह सुल्तानपुर (शहर) की विधानसभा सीट पर बसपा से टिकट की गुजारिश करने लगे लेकिन बसपा ने टिकट नहीं दिया. फिर उन्होंने डॉक्टर अयूब खान वाली पीस पार्टी ज्वाइन कर ली लेकिन इस चुनाव में सोनू सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा था.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब पहली बार वरुण गांधी सुल्तानपुर आए तो दोनों भाई यानी की सोनू और मोनू मंच पर दिखाई दिए. जिसके बाद दोनों ने बीजेपी ज्वाइन कर ली. साल 2014 में लोकसभा चुनाव बीजेपी उम्मीदवार के रूप में वरुण गांधी लड़े और 116000 वोटों के भारी अंतर से जीत भी हासिल की थी. जिससे खुश होकर वरुण गांधी ने सोनू सिंह को अपना प्रतिनिधि भी घोषित कर दिया था. ये दोनों भाई साल 2014 से लेकर साल 2019 तक बीजेपी में ही रहे लेकिन जब उन्हें लगा कि बीजेपी 2019 में सुल्तानपुर लोकसभा सीट से मेनका गांधी को चुनाव लड़ना चाहती है तो वह पार्टी छोड़कर बसपा में शामिल हो गए और बसपा ने उन्हें गठबंधन में अपना लोकसभा प्रत्याशी बनाया.

पिछले लोकसभा चुनाव में गठबंधन के प्रत्याशी रहे सोनू सिंह ने बीजेपी प्रत्याशी मेनका गांधी को कड़ी टक्कर दी. जिसमें सोनू सिंह को सिर्फ 14000 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था. फिर साल 2021 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बसपा ने सोनू सिंह को निकाल दिया था. 2017 में मोनू सिंह यानी यशभद्र सिंह आरएलडी के टिकट पर इसौली से विधानसभा का चुनाव लड़े थे लेकिन जीत नहीं पाए थे. 

सुल्तानपुर लोकसभा सीट का जातीय समीकरण

कुल मतदाता- 18,34,355
महिला मतदाता- 8,79,932
पुरुष मतदाता- 9,54,358 
जातीय समीकरण की बात करें तो यहां करीब 3,31,841 ब्राह्मण वोटर हैं तो 3,51,527 ठाकुर (क्षत्रिय) मतदाता हैं. 4,60,246 दलित के साथ 3,42,183 मुस्लिम और 3,48,527 ओबीसी और अन्य मतदाता हैं.