11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार सात धमाके हुए थे, जिनमें 180 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए थे. इस दर्दनाक घटना के बाद जिन 12 लोगों को दोषी ठहराकर जेल भेजा गया था, उन्हें अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह कहते हुए बरी कर दिया कि उनके खिलाफ पेश किए गए सबूत भरोसे लायक नहीं थे और जांच में गंभीर खामियां थीं. यह फैसला सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक लंबा इंतजार और सवालों का सिलसिला भी सामने लाया है.
बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल किलोर और श्याम चंदक की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि इन 12 लोगों का धमाकों से कोई संबंध था. अदालत ने कहा कि बम किस प्रकार के थे, इसका भी सही विवरण तक रिकॉर्ड में नहीं था. जिन गवाहों की बात की गई, उनके बयान भरोसेमंद नहीं पाए गए और जिन वस्तुओं की बरामदगी दिखाई गई, वे भी सबूत के रूप में टिक नहीं सकीं. कोर्ट ने साफ कहा कि न्यायपालिका ने केवल अपना कर्तव्य निभाया है.
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले को पुलिस की पूरी विफलता बताया और कहा कि 12 मुस्लिम पुरुषों की जिंदगी के 18 साल बिना किसी अपराध के बर्बाद हो गए. उन्होंने महाराष्ट्र एटीएस और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल उठाए कि आखिर क्यों प्रताड़ना की शिकायतों को अनदेखा किया गया. ओवैसी ने मीडिया पर भी आरोप लगाया कि उसने ट्रायल से पहले ही इन लोगों को दोषी ठहरा दिया था. वहीं, शिवसेना नेता मिलिंद देवड़ा ने इस फैसले को अस्वीकार्य बताया और सरकार से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की मांग की.
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि इन लोगों को केवल पुलिस द्वारा जबरन कराई गई स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषी ठहराया गया था. उन्होंने पूछा कि इस मानसिक और शारीरिक यातना का मुआवज़ा अब कौन देगा? विशेष लोक अभियोजक उज्जवल निकम ने कहा कि यह फैसला बेहद गंभीर है और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी. वहीं, आरोपियों की ओर से पेश हुए अधिवक्ता युग चौधरी और एस मुरलीधर ने अदालत को इसके लिए धन्यवाद दिया और कहा कि यह फैसला न सिर्फ न्यायपालिका में विश्वास बहाल करता है, बल्कि मानवता में भी.