भाजपा अब दक्षिण भारत के गढ़ माने जाने वाले केरल में बड़ा खेल खेलने की तैयारी कर रही है. पार्टी ने हाल के स्थानीय चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया है, जिससे उत्साह बढ़ा है. गृह मंत्री अमित शाह ने इस मिशन की कमान संभाली और कार्यकर्ताओं को जोश के साथ चुनावी तैयारी के लिए प्रेरित किया. पार्टी विकास और सामाजिक मुद्दों को आधार बनाकर, वामपंथी विपक्षी दलों के खिलाफ अपना प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है.
गृह मंत्री अमित शाह ने केरल दौरे के दौरान कार्यकर्ताओं को चेताया कि इस बार जो कभी नहीं बदला, वह अब बदलेगा. उन्होंने अन्य राज्यों के उदाहरण देते हुए दिखाया कि भाजपा मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों में पहले नहीं थी, लेकिन अब सत्ता में है. केरल में सत्ता विरोधी माहौल का लाभ उठाकर पार्टी बड़े लक्ष्य तय कर रही है.
भाजपा का आत्मविश्वास आंकड़ों से भी साबित होता है. 2001 में भाजपा का वोट शेयर 3 प्रतिशत था, जो 2016 और 2021 के बीच बढ़कर 12-15 प्रतिशत तक पहुंच गया. लोकसभा चुनावों में भी पार्टी के प्रदर्शन ने यह दिखाया कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में धीरे-धीरे भाजपा की पकड़ मजबूत हो रही है.
राजधानी तिरुवनंतपुरम की नगर निगम और दो नगर पालिकाओं में हालिया चुनावों में भाजपा ने इतिहास रच दिया. 101 वार्डों में से 50 जीतकर पार्टी ने पहली बार केरल में मेयर पद हासिल किया. सभी छह नगर निगमों में NDA गठबंधन ने 23 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर पाया, जो पार्टी के लिए आने वाले विधानसभा चुनाव में मजबूत संकेत हैं.
भाजपा विकास के मुद्दों के साथ सामाजिक और भावनात्मक मुद्दों को भी अपने चुनावी अभियान में शामिल कर रही है. सबरीमाला मुद्दा धीरे-धीरे पार्टी के लिए अहम बन रहा है. दक्षिणी केरल में हिंदू मतदाताओं और ओबीसी समुदाय के कुछ वर्गों के समर्थन ने पार्टी की रणनीति को सफल बनाने में मदद की है.
ओबीसी समुदाय हिंदू समुदाय का 26 प्रतिशत है. पार्टी के नेता जैसे के सुरेंद्रन, वी मुरलीधरन और शोभा सुरेंद्रन इसी समुदाय से आते हैं. उनके नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता के कारण भाजपा की पहुंच न केवल शहरी बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ रही है, जिससे केरल में पार्टी का भविष्य उज्ज्वल दिख रहा है.