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जब संतुलन बनाए रखने का नाम सेंसरशिप बन जाए

आज इंटरनेट पर बोलने की आजादी बची है, लेकिन सुनाई देने की आजादी खत्म हो रही है. निजी प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम तय करते हैं कि किसकी आवाज दबेगी और किसकी गूंजेगी. भारत भी इस जंग के केंद्र में है.

Anuj
Edited By: Anuj
जब संतुलन बनाए रखने का नाम सेंसरशिप बन जाए

कभी इंटरनेट को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चौपाल कहा जाता था, जहां हर व्यक्ति बिना डर के बोल सकता था. अब वो सपना टूट चुका है. अब सवाल यह नहीं कि कौन बोलेगा, बल्कि यह कि किसे सुना जाएगा. यह फैसला न अदालत करती है, न संसद, बल्कि कुछ मुट्ठी भर तकनीकी कंपनियों के बंद कमरों में चलने वाले कोड करते हैं. भारत जैसे सबसे बड़े डिजिटल समाज में यह लड़ाई और तीखी हो गई है.

आजादी और पहुंच में फर्क

बोलने की आजादी का मतलब अब सिर्फ पोस्ट डालने भर से पूरा नहीं होता. पोस्ट रहती है, पर कोई देखता नहीं. वीडियो अपलोड होता है, पर सुझावों में नहीं आता. इसे कहते हैं शैडो-बैनिंग. बिना सूचना, बिना अपील के आपकी आवाज गायब कर दी जाती है. यह नई सेंसरशिप है– खामोश, लेकिन खतरनाक.

मॉडरेशन या विचारधारा का फिल्टर

पहले मॉडरेशन का मतलब स्पैम और हिंसा रोकना था. अब यह तय करता है कि कौन सा विचार ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा. एक छोटा-सा नीतिगत बदलाव रातोंरात लाखों क्रिएटर्स की कमाई छीन लेता है. कोई पारदर्शिता नहीं, कोई जवाबदेही नहीं. यूजर को पता भी नहीं चलता कि उसका फीड कितना इंजीनियर्ड है.

गुस्सा बेचने का धंधा

प्लेटफॉर्म्स को शांति से नहीं, विवाद से पैसा मिलता है. जितना गुस्सा, उतना एंगेजमेंट, उतनी कमाई. इसलिए एल्गोरिदम झगड़े बढ़ाते हैं, अफवाहें चलाते हैं. सरकारें, पार्टियां, लॉबियां– सब इसका फायदा उठाती हैं. हर व्यक्ति को उसकी पसंद का अलग-अलग राजनीतिक सच परोसा जाता है. एक ही देश में हजार सच्चाईयां बन जाती हैं.

भारत की अनोखी जंग

भारत में अंतरपक्ष नियमों ने प्लेटफॉर्म्स को 36 घंटे में कंटेंट हटाने को बाध्य किया है. डेटा प्रोटेक्शन कानून बना, पर सरकार को छूट मिली. डीपफेक चुनावों में तबाही मचा रहे हैं, पर अभी तक कोई खास कानून नहीं. कोर्ट हर हफ्ते नए केस सुन रहे हैं. भारत जो रास्ता चुनेगा, दुनिया उसे देखेगी.

नया सामाजिक अनुबंध चाहिए

अब लोकतंत्र की असली परीक्षा यह है कि निजी कंपनियों के हाथ में जनता का चौपाल कैसे छीना जाए. इसके लिए जरूरी है एल्गोरिदम में पारदर्शिता, प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और नागरिकों को सशक्त बनाना. जब तक यह नहीं होगा, सच नहीं, कोड तय करेगा कि हम क्या जानें और क्या मानें.

हिमांशु शेखर, ग्रुप एडिटर, दैनिक भास्कर (यूपी, उत्तराखंड)