उम्र केवल संख्या है... बेटे को बनाया ड्राइवर और खुद 65 की उम्र में चला रही ऑटो, हौसला बढ़ाने वाली है 'मंगला आजी' की कहानी

बढ़ती उम्र और मधुमेह जैसी बीमारी के बावजूद मंगला ने तय किया कि वह आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर नहीं रहेंगी. वह अपने इलाज और घर के खर्च में योगदान देना चाहती थी. खाली बैठना उन्हें मंजूर नहीं था.

Anuj

मुंबई: भारत में साठ वर्ष के बाद का जीवन अक्सर आराम, निर्भरता और सीमित दायरे से जोड़ा जाता है. माना जाता है कि इस उम्र में लोग सार्वजनिक जीवन से दूर हो जाते हैं. लेकिन महाराष्ट्र के कराड और उंडाले को जोड़ने वाली सड़क पर 65 वर्षीया मंगला आवले इस सोच को रोज चुनौती देती हैं. लोग उन्हें प्यार से 'मंगला आजी' कहते हैं. हर सुबह वह अपना ऑटो-रिक्शा लेकर निकलती हैं और साबित करती हैं कि उम्र केवल संख्या है.

मंगला आवले का जीवन संघर्षों से भरा रहा है. जब उनके बच्चे छोटे थे, तभी उनके पति का निधन हो गया. चार बच्चों की परवरिश का पूरा भार उनके कंधों पर आ गया. उन्होंने मजदूरी करके बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और आत्मनिर्भर बनाया. आज उनका बेटा महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम (MSRTC) में चालक है और बेटियां अपने-अपने घरों में खुशहाल हैं. इस पड़ाव पर बहुत लोग आराम चुनते, लेकिन मंगला ने अलग रास्ता चुना.

आत्मसम्मान की मजबूत भावना

बढ़ती उम्र और मधुमेह जैसी बीमारी के बावजूद मंगला ने तय किया कि वह आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर नहीं रहेंगी. वह अपने इलाज और घर के खर्च में योगदान देना चाहती थी. खाली बैठना उन्हें मंजूर नहीं था. उन्होंने काम की तलाश शुरू की और ऑटो-रिक्शा चलाने का विचार किया. यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन उनके भीतर आत्मसम्मान की भावना अधिक मजबूत थी.

65 की उम्र में नई शुरुआत

अपने बेटे की मदद से मंगला ने मात्र पंद्रह दिनों में ऑटो चलाना सीख लिया. जो काम कई युवाओं को कठिन लगता है, वह उनके लिए आत्मविश्वास की सीढ़ी बन गया. अब वह रोज सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक कराड-उंडाले मार्ग पर सवारी ढोती हैं. प्रतिदिन 500 से 700 रुपये की कमाई उनके लिए केवल आय नहीं, बल्कि सम्मान की कमाई है. वह कहती हैं कि काम करने से मन और शरीर दोनों सक्रिय रहते हैं.

सड़कों पर बदलती सोच

ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग महिलाओं को व्यावसायिक वाहन चलाते देखना दुर्लभ है. मंगला की मौजूदगी इस धारणा को तोड़ती है. यात्री उन्हें पहचानते हैं और सम्मान देते हैं. अन्य चालक भी सहयोग करते हैं और अक्सर कहते हैं, 'पहले आजी को जाने दो'. धीरे-धीरे उनका यह कदम दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया है. वह दिखाती हैं कि उम्र सार्वजनिक जीवन से दूर होने का कारण नहीं बनती.

नियमों का सम्मान और जिम्मेदारी

जब परिवहन विभाग को उनके ऑटो चलाने की जानकारी मिली, तो उन्हें लाइसेंस की औपचारिकताएं पूरी करने को कहा गया. उन्होंने इसे चुनौती नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना. सीमित शिक्षा और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने विधिवत सरकारी ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त किया. उनका मानना है कि स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब उसके साथ नियमों का पालन भी हो. मंगला आवले की कहानी बताती है कि असली ताकत उम्र में नहीं, हौसले में होती है.