आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लाखों लोग नाइट शिफ्ट में काम कर रहे हैं. आईटी सेक्टर, अस्पताल, फैक्ट्री, कॉल सेंटर और कॉर्पोरेट कंपनियों में देर रात तक काम करना अब आम बात हो गई है. कई लोग इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा मान चुके हैं. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि शरीर पर इसका असर धीरे धीरे दिखाई देता है. एक्सपर्ट का मानना है कि शरीर का एक प्राकृतिक सोने जागने का चक्र होता है जिसे सर्कैडियन रिदम कहा जाता है. जब यह चक्र लगातार बिगड़ता है तो शरीर के कई जरूरी सिस्टम पर असर पड़ता है.
बता दें की पिछले कुछ सालों में हुई कई रिसर्च में यह समझने की कोशिश की गई है कि क्या नाइट शिफ्ट और कैंसर के बीच कोई संबंध है. कुछ स्टडी में यह पाया गया कि लंबे समय तक नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों में खास तरह के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. खासकर ब्रेस्ट कैंसर का खतरा. हालांकि अभी तक ऐसा कोई पक्का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है जो सीधे तौर पर यह साबित कर दे.
मानव शरीर एक तय समय के हिसाब से काम करता है. दिन में जागना और रात में सोना शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है. इसी प्रक्रिया को सर्कैडियन रिदम कहा जाता है. जब कोई व्यक्ति लगातार रात में काम करता है और दिन में सोता है तो यह प्रकिया बिगड़ जाती है. डॉक्टरों के मुताबिक इसका असर शरीर के कई महत्वपूर्ण कामों पर पड़ सकता है.
इनमें शरीर में हार्मोन का संतुलन, DNA की मरम्मत, इम्यून सिस्टम का काम, कोशिकाओं का दोबारा बनना शामिल हैं. अगर लंबे समय तक यह प्रक्रिया प्रभावित होती रहे तो शरीर में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
डॉक्टरों के अनुसार रात के समय शरीर मेलाटोनिन नाम का हार्मोन बनाता है. यह हार्मोन अच्छी नींद और शरीर की रिकवरी के लिए जरूरी माना जाता है. लेकिन जब कोई व्यक्ति देर रात तक तेज रोशनी में काम करता है तो मेलाटोनिन प्रभावित हो सकता है. कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि लंबे समय तक मेलाटोनिन का स्तर बिगड़ने से शरीर में बीमारी का खतरा बढ़ सकता है.
नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों में अक्सर पूरी नींद न लेना, गलत समय पर खाना खाना, फास्ट फूड ज्यादा खाना, शारीरिक गतिविधि कम होना, तनाव और चिंता बढ़ना, वजन बढ़ना जैसी समस्याएं देखी जाती हैं.