हेल्थ चेकअप करा रहे हैं, फिर भी दिल का खतरा छूट तो नहीं रहा? जानें कौन-सी जांच जरूरी
भारत में हेल्थ चेकअप को लेकर लोगों की सोच तेजी से बदल रही है. अब जांच केवल बीमारी के लक्षण दिखाई देने तक सीमित नहीं है. लोग पहले से अपनी सेहत के बारे में जानने और संभावित जोखिमों को पहचानने के लिए जांच करा रहे हैं.
नई दिल्ली: भारत में हेल्थ चेकअप को लेकर लोगों की सोच तेजी से बदल रही है. अब जांच केवल बीमारी के लक्षण दिखाई देने तक सीमित नहीं है. लोग पहले से अपनी सेहत के बारे में जानने और संभावित जोखिमों को पहचानने के लिए जांच करा रहे हैं. रेडक्लिफ लैब्स में होने वाली लगभग हर तीन में से दो जांचें प्रिवेंटिव यानी बचाव और समय रहते जोखिमों की पहचान के उद्देश्य से कराई जाती हैं.
लेकिन जब बात दिल की सेहत की हो, तो एक अहम सवाल सामने आता है, क्या हम सिर्फ ज्यादा जांच करा रहे हैं, या उन जोखिमों की पहचान के लिए सही जांच भी करा रहे हैं जो दिल की बीमारी का कारण बन सकते हैं?
सबसे ज्यादा कराए जाते हैं ये पांच चेकअप्स:
रेडक्लिफ लैब्स के राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा कराए जाने वाले पांच चेकअप्स में सीबीसी, लिपिड प्रोफाइल, किडनी फंक्शन टेस्ट (केएफटी), लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी) और एचबीए1सी शामिल हैं. ये जांचें शरीर की सामान्य स्थिति और कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेतकों की जानकारी देती हैं. हालांकि, सामान्य हेल्थ चेकअप से दिल की बीमारी के जोखिम की पूरी तस्वीर हमेशा सामने नहीं आती.
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, ब्लड में ग्लूकोज और फैट का बढ़ा स्तर और ज्यादा वजन और मोटापा हृदय संबंधी बीमारियों के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं. इसके अलावा असंतुलित खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी और तंबाकू का सेवन भी महत्वपूर्ण जोखिम बढ़ाते हैं. इनमें से कई जोखिम ऐसे हैं जो किसी गंभीर घटना के होने से काफी पहले शरीर में मौजूद हो सकते हैं और जरूरी नहीं कि उस समय कोई स्पष्ट लक्षण भी दिखाई दें.
छह महीने के आंकड़ों का विश्लेषण:
रेडक्लिफ लैब्स द्वारा 2.4 लाख से ज्यादा लोगों के छह महीने के आंकड़ों का विश्लेषण इस तस्वीर को और क्लियर करता है. विश्लेषण में करीब हर 2 में से 1 व्यक्ति में कोलेस्ट्रॉल, LDL, HDL, ट्राइग्लिसराइड्स, hs-CRP, NT-proBNP और hs-Troponin I जैसे हृदय स्वास्थ्य से जुड़े प्रमुख संकेतकों में असामान्य परिणाम पाए गए.
26 वर्ष से ज्यादा उम्र के पुरुषों में 48 प्रतिशत के परिणाम असामान्य पाए गए, जबकि 40 वर्ष से ज्यादा उम्र के पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 52 प्रतिशत रहा.
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये आंकड़े किसी व्यक्ति में हृदय रोग होने की पुष्टि नहीं करते. ये केवल जांच के दौरान सामने आए असामान्य परिणामों को दर्शाते हैं. फिर भी, ये इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि सिर्फ सामान्य हेल्थ चेकअप या बीमारी के लक्षणों के आधार पर दिल की सेहत का पूरा आकलन करना पर्याप्त नहीं हो सकता.
सिर्फ कोलेस्ट्रॉल ठीक होना ही दिल की सेहत का पूरा पैमाना नहीं:
रेडक्लिफ लैब्स की डायरेक्टर, लैब ऑपरेशंस, डॉ. सोनल सक्सेना, ने कहा, कोलेस्ट्रॉल की रिपोर्ट सामान्य आने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि व्यक्ति के दिल से जुड़े सभी जोखिम खत्म हो गए हैं. हृदय स्वास्थ्य कई अलग-अलग कारकों पर निर्भर करता है. जिन लोगों में हृदय रोग से जुड़े जोखिम मौजूद हैं, उनके लिए सामान्य लिपिड प्रोफाइल से आगे जाकर कुछ अन्य संकेतकों को देखना उपयोगी हो सकता है. Lp(a), ApoB और hs-CRP जैसे संकेतक कुछ लोगों में जोखिम को बेहतर ढंग से समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी दे सकते हैं. हालांकि, इसका उद्देश्य हर व्यक्ति के लिए ज्यादा से ज्यादा जांच कराना नहीं, बल्कि व्यक्ति के जोखिम के अनुसार सही जांच का चुनाव करना होना चाहिए.
Lipoprotein(a), यानी Lp(a), एक ऐसा संकेतक है जिस पर आनुवंशिक प्रभाव काफी ज्यादा होता है. इसका स्तर बढ़ा होने पर एथेरोस्क्लेरोटिक कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, जिसमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक शामिल हैं, का जोखिम बढ़ सकता है. यह जोखिम तब भी मौजूद हो सकता है, जब सामान्य LDL कोलेस्ट्रॉल बहुत ज्यादा न हो.
2026 ACC/AHA डिस्लिपिडेमिया गाइडलाइन में Lp(a) की जांच कम से कम एक बार कराने की सिफारिश की गई है. गाइडलाइन के अनुसार 125 nmol/L (50 mg/dL) या उससे ज्यादा का Lp(a) स्तर जोखिम बढ़ाने वाला कारक माना जाता है. वहीं 250 nmol/L (100 mg/dL) या उससे ज्यादा के स्तर कम से कम दोगुने अनुमानित हृदय संबंधी जोखिम से जुड़े हैं.
इसी तरह, ApoB शरीर में मौजूद उन कणों की संख्या के बारे में जानकारी देता है जो धमनियों में वसा जमा होने से जुड़े होते हैं. बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स या मधुमेह वाले लोगों में यह जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है. hs-CRP शरीर में सूजन की स्थिति के बारे में अतिरिक्त जानकारी दे सकता है.
वहीं hs-Troponin I और NT-proBNP जैसे संकेतकों का इस्तेमाल विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में किया जाता है. ये हृदय की मांसपेशियों में हुई क्षति या हृदय पर पड़ने वाले दबाव का आकलन करने में मदद कर सकते हैं.
इसलिए जरूरत केवल ज्यादा जांच कराने की नहीं है, बल्कि व्यक्ति के स्वास्थ्य और जोखिम को समझकर यह तय करने की है कि उसके लिए कौन-सी जांच वास्तव में उपयोगी है.
रिपोर्ट मिलना अंत नहीं, सही कदम उठाने की शुरुआत है:
रेडक्लिफ लैब्स के फाउंडर एवं सीईओ, आदित्य कंडोई, ने कहा, हम जानते हैं कि चुनौती केवल स्वास्थ्य जोखिमों की पहचान करने तक सीमित नहीं है. असली जरूरत लोगों को उन जोखिमों पर कार्रवाई करने में मदद करने की है. इसी सोच के साथ हमने हर जांच के साथ 4X Value की शुरुआत की है. हमारा मानना है कि डायग्नोस्टिक जांच का काम केवल एक रिपोर्ट देना नहीं होना चाहिए. लोगों को यह भी समझना चाहिए कि रिपोर्ट में सामने आए परिणाम उनके स्वास्थ्य के लिए क्या मायने रखते हैं और उन्हें आगे क्या कदम उठाना चाहिए. व्यक्तिगत खान-पान और स्वास्थ्य संबंधी सहायता के जरिए हमारा प्रयास लोगों को अपने जोखिम को समझने से आगे बढ़कर अपनी सेहत के लिए जरूरी बदलाव करने में मदद करना है. किसी समस्या की पहचान तभी सार्थक है, जब उसके बाद उस पर कार्रवाई भी हो.
Missing the Mishaps अभियान के जरिए रेडक्लिफ लैब्स इस वर्ल्ड हार्ट डे पर लोगों का ध्यान केवल जांच कराने से आगे बढ़कर अपने हृदय संबंधी जोखिमों को समझने, जांच के परिणामों का सही अर्थ जानने और समय रहते जरूरी कदम उठाने की ओर आकर्षित कर रहा है.