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मनोज बायपेयी की 'घूसखोर पंडित' पर मचा बवाल, दिल्ली हाईकोर्ट में दायर हुई याचिका, जानें क्यों विवाद में घिरी फिल्म

'घूसखोर पंडित' नीरज पांडे की प्रोडक्शन में है और रितेश शाह ने डायरेक्ट किया है. इसमें नुसरत भरुचा और साकिब सलीम भी हैं. यह एक थ्रिलर है, जहां एक पुलिस अधिकारी की रात एक घायल लड़की की मदद से अपराध के जाल में बदल जाती है.

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Edited By: Antima Pal
मनोज बायपेयी की 'घूसखोर पंडित' पर मचा बवाल, दिल्ली हाईकोर्ट में दायर हुई याचिका, जानें क्यों विवाद में घिरी फिल्म
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मुंबई: मनोज बाजपेयी की नई फिल्म 'घूसखोर पंडित' रिलीज से पहले ही बड़े विवाद में घिर गई है. नेटफ्लिक्स पर आने वाली इस थ्रिलर फिल्म का टीजर हाल ही में लॉन्च हुआ, लेकिन इसका टाइटल 'घूसखोर पंडित' लोगों को खासा भड़का रहा है. सोशल मीडिया पर भारी विरोध हो रहा है और अब मामला कानूनी स्तर पर पहुंच गया है.

मनोज बायपेयी की 'घूसखोर पंडित' पर मचा बवाल

फिल्म में मनोज बाजपेयी एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी 'अजय दीक्षित' का रोल निभा रहे हैं, जिन्हें 'पंडित' के नाम से जाना जाता है. टीजर में दिखाया गया है कि यह अधिकारी 20 साल से सब-इंस्पेक्टर पर अटका हुआ है और भ्रष्टाचार के जाल में फंसा है. लेकिन विवाद टाइटल पर है, जहां 'घूसखोर' जैसे शब्द को 'पंडित' के साथ जोड़ा गया है. कई लोग इसे ब्राह्मण या पंडित समुदाय के खिलाफ अपमानजनक और सामूहिक मानहानि मान रहे हैं. 

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर हुई याचिका

उनका कहना है कि 'पंडित' शब्द भारतीय संस्कृति में विद्वता, आध्यात्मिकता और सम्मान का प्रतीक है, इसे भ्रष्टाचार से जोड़ना गलत है. मुंबई के वकील आशुतोष दुबे ने नेटफ्लिक्स और फिल्म के मेकर्स को लीगल नोटिस भेजा है. नोटिस में टाइटल को 'मानहानिकारक, समुदाय-विरोधी, असंवैधानिक और सामाजिक उत्तेजना फैलाने वाला' बताया गया है. उन्होंने मांग की है कि टाइटल तुरंत हटाया जाए, क्योंकि यह पूरे समुदाय की गरिमा को ठेस पहुंचाता है. 

फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग

उनका तर्क है कि भ्रष्टाचार व्यक्तिगत कमजोरी है, इसे किसी समुदाय की विशेषता नहीं बनाया जा सकता. इसके अलावा दिल्ली हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की गई है. वकील विनीत जिंदल की ओर से दाखिल इस याचिका में फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई है. 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब घृणा करना नहीं

याचिका में कहा गया है कि टाइटल और कहानी में 'पंडित' को रिश्वतखोरी से जोड़ना सामूहिक मानहानि है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन करता है. यह घृणा भाषण, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला माना जा रहा है. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब घृणा फैलाना या समुदाय की छवि खराब करना नहीं है.

सोशल मीडिया पर भी बवाल मचा हुआ है. कई यूजर्स ने टाइटल को जातिवादी बताया और नेटफ्लिक्स से नाम बदलने या फिल्म बैन करने की मांग की. कुछ ने लिखा- 'अगर 'घूसखोर मुस्लिम' या 'घूसखोर दलित' नाम रखते तो क्या होता?' भोपाल, जयपुर समेत कई जगहों पर ब्राह्मण संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए और FIR की मांग की.